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जून 25, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

राजू श्रीवास्तव को भावभीनी श्रद्धांजलि

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कह कर दुनिया को अलविदा,  गजोधर भैया यूँ जल्दी चले गये।  कहलाते थे वो कोमेडी के बादशाह,  आज सबको उदास यूँ छोड़ गये।  याद आती है आज उनकी, वो हास्य प्रस्तुतियाँ,  जो सच में सबको आनंदित करने वाली थीं।  हर वाक्य में झलकती, वो कानपुर की शैली,  जो सबको पल भर में गुदगुदाने वाली थी।  वो शख्स दिखते, बहुत साधारण से थे,  पर उनकी शख्सियत बहुत निराली थी।  मंच पर पहुँचते ही चेहरे पर सबके,  एक हँसी की लहर ले आने वाली थी।  आज मंच है पर नहीं हो आप राजू भैया,  जो फिर से हम सबको बहुत हँसाओगे।  जब जब जिक्र होगा कामेडी का दिल से,  आप सच में सबको बहुत याद आओगे।  आप सच में सबको बहुत याद आओगे।  प्रेषक - दीप्ति सोनी

अनुभव का अर्थ और उसकी महत्वता

जीवन में अक्सर हम अनुभवों से जुड़ी बातें कहते या सुनते हैं या फिर कभी कभी अपने अनुभव दूसरों से समय समय पर साझा करते हैं। तो क्या है इस अनुभव का अर्थ और उसकी महत्वता। इस बात पर थोड़ा प्रकाश डालने की आवश्यकता है।  मेरे अनुसार " किसी कार्य व व्यवहार को निरंतर प्रयोग करते रहने व उस कार्य और व्यवहार की परीक्षा के परिणाम स्वरूप प्राप्त ज्ञान को अनुभव  कहते हैं। " अनुभव किसी भी इंसान के जीवन की अमूल्य निधि होते हैं। जिनके बल पर एक इंसान अपनी जिंदगी में आगे बढ़ता चला जाता है और समाज में अपनी एक नई छवि बनाने में सक्षम हो पाता है। अतः यह कहना गलत न होगा कि अनुभव ही एक व्यक्ति के व्यक्तित्व को किसी दूसरे व्यक्ति के व्यक्तित्व से अलग करते हैं। जीवन में चाहे धन, मित्र, रिश्तेदार, और समाज व्यक्ति के काम आये न आये परन्तु अच्छा और बुरा अनुभव ही इंसान की जिंदगी में हमेशा काम में आता है। अनुभव इंसान का वो रथ है जिसका सारथी स्वंय मनुष्य है और जिसके साथ एक मनुष्य बहुत कुछ हाँसिल कर सकता है और जीवन में अच्छे ,बुरे का भेद भी समझ पाता  है। अनुभव ही प्रगति व समाज को जोड़ने का कार्य करत...

पापा पर कविता

मेरे पापा मेरी पहचान,  मेरे लिए हैं वो भगवान।  जिस दिन पापा नाराज हो जाते,  फीकी पड़ जाती मेरी मुस्कान।  नन्ही सी मुझे गोद में खिलाया,  अंगुलियाँ पकड़कर मुझे चलना सिखाया।  पापा की हूँ मैं प्यारी बेटी,  हर दिन मुझको कुछ अच्छा सिखाया।  सुबह स्कूल उनका, मुझे छोड़ने जाना,  स्कूल से मेरा फिर घर वापस आना।  फोन करके पूछते ऑफिस से,  बिटिया तुम आ गयी जरा बताना।  हर चीज़ का वो मेरा ध्यान रखते,  मेरे लिए हर दिन सोचते रहते।  शिक्षित होकर काबिल बन जाऊँ,  इसलिए दिन रात वो मेहनत करते।  शनिवार, इतवार होते मेरे लिए खास,  जब मैं जाती घूमने पापा के साथ।  नयी नयी फरमाइश करती पापा से,  नखडे दिखाती मैं उनको हजार।  भगवान से मेरी अब यही प्रार्थना,  मेरे पापा को देना खुशियाँ हज़ार।  स्वस्थ, सुखी रखना हरदिन उनको,  कभी न करना उनको उदास।  (दीप्ति सोनी)  दूसरी कविता पिता बच्चों की मुस्कान हैं,  पिता बच्चों का अभिमान हैं।  पिता के साये में रहकर ही,  बच्चों की खुशियाँ आबाद हैं।...

सत्य एक अंसुलझी पहेली

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कहते हैं "सत्य से मुठभेड़ किये बगेर आप अपने आप को कभी पा नहीं सकते हैं।" तो क्या है ये सत्य, ये सवाल न जाने कितने बुद्धिजीवियों के मन में उथल पुथल मचाता है और नयी परिभाषाओं को जन्म देता है। ऐसी अनेक परिभाषाओं में से, मैं भी सत्य की परिभाषा को अपनी कलम का रूप देना चाहूँगी।  "सत्य वे है जिसे हम अपनी पहली साँस से अंतिम हिचकी तक जीते है। उससे प्यार करते हैं और अपने खिलाफ कोई सच बोले तो हम उससे नफ़रत भी करते हैं और अपनी पोल खुल जाने के डर से भयभीत भी होते हैं पर दूसरों के गोपनीय रहस्य को जानने के लिए हमेशा बेताब रहते हैं।"  यही वजह है कि आज कल लोग गूगल सर्च करते हैं, यूट्यूब देखते हैं, किताबें पड़ते हैं और सत्य जानने के लिये ज्योतिषियों के चक्कर लगाते हैं। वैसे सत्य एक जटिल शब्द है। सत्य का स्वभाव ऐसा है कि ये कभी कभी इंसान को विचलित कर देता है तो उसे उस समय सत्य को हजम कर पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। लेकिन एक सच ये भी है कि इस सत्य को अंत में स्वीकार भी करना पड़ता है। अगर ऐसा नहीं होता तो हम मृत्यु को स्वीकार ही न कर पाते। कई बार हमारे मन में एक असुरक्षा क...

सावन का श्रृंगार भोले

बारह ज्योतिर्लिंग तुमसे सुशोभित,  इस धरा के तुम पालनहार हो।  है ओंकारेश्वर, है महाकालेश्वर,  सावन का तुम ही श्रृंगार हो।  सावन के प्रथम सोमवार में,  महादेव आपका स्वागत है।  सच्चे मन से जो कोई तुम्हें पूजे,  उसका हो जाता भव से बेड़ा पार है।  ये सावन भी अधूरा सा लागे जब,  बम बम भोले का नाद न सुने।  आक, धतूरा और भाँग चढ़ाकर,  जब तक भोले तुम्हारा गुणगान न करें।  है कैलाशी, है गंगाधर,  सब भक्तों की फरियाद तुम सुनना।  सावन की इन मीठी-मीठी फुआरों में,  जनमानस का कल्याण तुम करना।  प्रेषक- दीप्ति सोनी

हिन्दी दिवस पर कविता

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नदी की धारा के समान चंचल भाषा,  वो प्यारी भाषा हमारी हिन्दी है।  हर प्रान्त की मिठास को समाहित किये,  वो न्यारी भाषा हमारी हिन्दी है।  हर अक्षर है इसका अद्भुत,  जो हर शब्द को खास बनाता है।  स्वरों की चादर में लिपटकर,  हर वाक्य को अर्थपूर्ण बनाता है।  भावनाओं के सागर में बहकर जब,  कोई शब्द जुबान पर आता है।  तब कोई लेखक हो या वक्ता,  अपने मर्म को समझा पाता है।  उस मर्म की गहराइयों को सहजता से,  अभिव्यक्त कराती हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी है।  भारत देश की शान है जो भाषा,  वो भाषा हमारी हिन्दी है।  वो भाषा हमारी हिन्दी है।  प्रेषक - दीप्ति सोनी

विचारों की शक्ति

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  हम हर दिन कभी न कभी अपनी बातों में  सामान्यता यह कहता हुआ पाते हैं कि आज हमारे मन में ये विचार आया या मेरे विचार से यह होना चाहिए इत्यादि इत्यादि। तब प्रश्न यह उठता है की यह विचार होते क्या हैं तथा किसी कार्य को करने में इनकी क्या भूमिका होती है।  हमारे दिमाग में हर क्षण अनेको सकारात्मक और नकारात्मक विचार आते हैं। इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि विचारों के संग्रह का नाम ही विचार होता है और इन विचारों को संग्रह करने वाला विचारक कहलायेगा। विचार एक ऐसी क्षमता और शक्ति है जो भगवान् ने हम मनुष्यों को इतनी प्रभावशाली तरीके से दी है ताकि हम मनुष्य अपने जीवन में  हर रोज आने वाली समस्याओं का तुरंत समाधान कर पाए। चाहे वो समस्याएँ आंतरिक हो या बाहरी। बशर्ते मनुष्य विचारों को क्रियान्वयन करने के लिए जागरूक हो, चिंतनशील हो और चेतना में हो। सोये हुए व्यक्ति के दिमाग में कितने भी विचार आयें और जायें ,उससे कोई समस्या का समाधान नहीं हो सकता। विचार उन बादलों की तरह हैं जो कभी रुकते नहीं और नदी में तैरती हुई उस नाँव की तरह हैं जिसके तैरने से नदी की गहराइ...

द्रौपदी मुर्मू की ऐतिहासिक जीत

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राजनीति के इस कड़े मुकाबले में जब,  कोई महिला सर्वोच्च सम्मान पाती है।  दिल प्रफुल्लता से भर जाता,  मन देता बार बार बधाई है।  रूप, रंग, जात-पात आड़े नहीं आती,  जब होंसलों में लंबी उड़ान होती है।  उस पद की भी गरिमा बढ़ जाती जब,  कोई नारी उस पर आसीन होती है।  आदिवासी जाति की होकर के भी,  जो मान द्रौपदी मुर्मू आपने पाया है।  15 वीं राष्ट्रपति बनकर भारत की,  सच में इस देश का मान बढ़ाया है।  इस ऐतिहासिक जीत पर द्रौपदी मुर्मू जी, देता पूरा देश आपको बहुत बहुत बधाई।  सफल, सुमंगल हो आपका ये सफर,  जिस पद की आपने, आज शोभा बढ़ाई।  प्रेषक- दीप्ति सोनी

कोरोना की शादी (कविता)

कोरोना तेरे लिए पतंजलि वालों ने,  एक लड़की ढूँढ निकाली है।  कोरोनिल है उसका नाम,  जिससे तेरी शादी होने वाली है।  रामदेव हैं पिता उसके,  प्रकृति उसकी माता है।  अब क्या होगा तेरा कोरोना,  तू इस बंधन में बंधने वाला है।  आवारा बनकर घूमा है तू,  इस पूरी दुनिया में अब तक।  अपने राक्षसी स्वभाव के कारण,  तूने क्षति पहुँचाई है हर पल।  पूरी दुनिया ढूँढ रही जिसे,  वो बैठी थी भारत में छिपकर।  अब जाकर कहीं बाहर आयी,  अपने पिता जी के कहने पर।  कुछ सीख ले तू,  भारत के संस्कारों से।  एक बेटी दे रहा योगी बाप,  तुझे अपने हाथों से।  ये शुभ घड़ी देश में,  आज फिर आई है।  कोरोना वाइरस तुझे,  अनेक-अनेक भधाई है।  इस बंधन में बंधके तू,  यहाँ से जल्दी से निकल ले।  बहुत विचरण कर लिया तूने दुनिया का,  अपने घर में जाकर आराम तू करले।  प्रेषक- दीप्ति सोनी

प्रात:कालीन द्रश्य (कविता)

भोर हुई उजाला फैला,  सूरज के आ जाने पर | प्रकाश से चमक उठी धरती,  किरणों के फैल जाने पर | विशाल अंबर में उड़ते पक्षी,  मस्त पवन में यूँ झूम रहे | अपनी चहचाहट की ध्वनि से,  कानों में मिश्री घोल रहे | हर लता, पेड़ और डाली धरा पर,  झूम झूम कर यूँ नाच रही | सुंदर पुष्प खिलाकर वो मानों,  मन ही मन इठला रही | कितना सुंदर दृश्य है प्रातः का,  इसमें बस खो जाएँ हम | महसूस करें इसकी सुंदरता को,  अपने अंतर्मन को भी जगायें हम |                 प्रेषक -दीप्ति सोनी

दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएं (कविता)

जब जब दिवाली आती है,  मन को हर्षित कर जाती है।  लक्ष्मी गणेश के आगमन की तैयारी,  मन में नई ऊर्जा का संचार कर जाती है।  हर कोना कोना प्रकाशमान हो जाता,  नभ में भी पटाखों का अंबार नजर आता।  हर द्वार - द्वार पर सुंदर रंगोली सजतीं,  घर में भी खुशियों का संसार बस जाता।  मेरी दिवाली, आपकी दिवाली,  है ये दिवाली हम सबकी भी।  हँसों, हँसाओं, खुशियाँ बाँटों,  कामना करो सबकी सुख समृद्धि की।  मिठाइयों की मिठास से सराबोर हो,  हर रिश्ता ,भावनाएं और जिव्हा सबकी।  माता लक्ष्मी का आशीर्वाद मिले आप सबको,  यही है आप सभी के लिये शुभकामनायें दिल से मेरी।  प्रेषक- दीप्ति सोनी

तकनीक का विकास स्मार्ट फोन (कविता)

तकनीक के विकास ने,  ये कैसा जादू ला दिया,  क्या तारीफ करूँ इस जादू की,  जिसने सबको इसका कायल बना दिया।  कोई खींचता इससे फोटो,  कोई करता इससे घंटों बातें।  वॉट्सएप करके, गेम खेलकर,  कट जाती दिन और रातें।  यूट्यूब, फेसबुक, ट्वीटर, इंस्टाग्राम,  इन्हीं का आज जमाना है।  इनमें दिन भर व्यस्त रहकर ही लोग बुनते समाजिकता का ताना बाना है।  मनोरंजन का साथी है ये,  ज्ञान का भंडार कहलाता है।  अंगुलियों के स्पर्श होते ही ये ,  हर दृश्य पटल पर लाता है।  इंटरनेट है इसकी आत्मा,  जो संचालित करती इसके गुणों को।  कार्य पल भर में हो जाते सबके,  जो कोई आदेश देता इसको।  शिक्षित- अशिक्षित का हथियार है ये,  जो हर पल काम में आता है।  एक जगह बैठे बैठे ही,  पूरी दुनिया की शैर करवाता है।  भिन्न भिन्न नामों से सजा हुआ,  स्मार्ट फोन नाम है इसका।  जो कोई इसको हाथ में लेता,  वो स्वतः ही आत्मविश्वास से भर उठता।  (दीप्ति)

मन की बात ईश्वर के साथ

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  विविध जिज्ञासाओं की आंधी ने, कब मेरी सोच के आवेग को रोका था । हर क्षण हर पल विचारों की दुनिया में, मैंने अपनी मस्तिष्क  निरंतर झोंका था। मंथन हुआ जज्बातों का मन और दिल से, कभी मेरे अनुभवों, कभी मेरी शिक्षा ने मुझे राह दिखाई। मेरे संस्कारों ने मुझे मर्यादाओं में सीमित रखकर, मेरे मन में एक निर्णायक सोच बनाई। सोच यही कहती है बस, खुद पर पूर्ण विश्वास करो। कभी ना थको, कभी ना डरो, निरंतर तुम प्रयास करो। चौखट पर जलता दीपक भी, आंधी से लड़ने की ताकत रखता है। बुझते बुझते फिर से जल उठता, अपने आप पर पूर्ण भरोसा रखता है। शिथिल हो जाए मन मस्तिष्क तुम्हारा, कभी न बिखरो, कभी न टूटो तुम। उस परमात्मा की शरण में जाकर, फिर से अपने वजूद को टटोलो तुम। पाओगे वह असीम शक्ति, जिसका तुम्हें अंदाजा नहीं। एक बार आजमा के देखो मेरा यह अनुभव, क्या पता कल बन जाए यह अनुभव, आपका भी। लेखिका - दीप्ति सोनी

संस्कृति और सभ्यता में अंतर

मनुष्य के सम्पूर्ण विकास में उसकी संस्कृति और सभ्यता का विशेष  योगदान रहा है इसलिए हम सभी अपने जीवन में अनेकों बार संस्कृति और सभ्यता की बातें करते और सुनते  हैं | तो क्या है ये संस्कृति और सभ्यता ? क्या ये दोनों एक हैं या भिन्न ? इसको थोड़ा समझने की आवश्यकता है |  सभ्यता [civilization ] और संस्कृति [culutre  ] मानवीय समाजिक जीवन की अमूल्य संपत्ति है जिसके कारण मानव को पशु से भिन्न समझा जाता है तथा सभ्यता, संस्कृति का विशेष अंग है | यद्यपि  इन दोनों को एक दूसरे से भिन्न नहीं किया जा सकता परन्तु इन दोनों के स्वरुप में भिन्नता देखी और समझी जा सकती है |  सभ्यता और संस्कृति में अंतर  सभ्यता से मनुष्य के भौतिक क्षेत्र की प्रगति सूचित होती है जबकि संस्कृति से मनुष्य की मानसिक क्षेत्र की प्रगति सूचित होती है |  सभ्यता साधन है जबकि संस्कृति साध्य /साधना है |  संस्कृति में गहराई होती है जबकि सभ्यता में गहराई का अभाव होता है |  संस्कृति का सम्बन्ध व्यक्ति और समाज में निहित संस्कारों से होता है और उसका निवास व्यक्ति के  मस्तिष्क ...

गणतंत्र दिवस पर बसंत का आगमन

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बसंत पंचमी की फुहार में, गणतंत्र दिवस का जश्न है। कहीं मां शारदे का पूजन है, कहीं देशभक्ति के गीतों में डूबा, मेरा प्यारा ये भारत वतन है। आकाश में मदमस्त होकर फहराता तिरंगा, गा रहा अपनी शौर्य की वीरगाथा। हर विद्यार्थी मां शारदे के चरणों में, झुका रहा है सजल भाव से अपना माथा। कितना सुंदर, कितना पावन, कितना अद्भुत यह नजारा है। मां शारदे का अभिनंदन है। गणतंत्र दिवस पर वसंत का आगमन है। हे शारदे मां तू इस पावन पर्व पर, हम सब को यह आशीर्वाद दें। हर विद्या से परिपूर्ण हो हमारा तन मन, हर सांस इस वतन के लिए कुर्बान रहे। लेखिका - दीप्ति सोनी

हास्य कविता - वृंदावन की अद्भुत सच्चाई

                         हास्य कविता राधे राधे बोलते हुए सब,  वृंदावन को भागे आते हैं।  मंदिर के बाहर आते ही सब,  कुछ खाने को ललचाते हैं।  भल्ले, टिकिया, चाट- पकौड़ी,  ढोकला, लस्सी और रसमलाई।  कभी कचौरी, जलेबी की खुशबू से,  जीभ निकलकर घुटनों तक आई।  पेट भर जाता पर मन नहीं भरता,  इन स्वादिष्ट व्यंजनों की भरमार से।  भर भर दोने मिनटों में, सफाचट हो जाते,  पहले मैं, पहले मैं की तकरार में।  ठुस्सम ठुस्सा इस भीड़ के कारण,  हम कहीं से कहीं पहुँच जाते हैं।  क्या लेना था, कहाँ रुकना था।  बस जोर जोर से चिल्लाते हैं।  बंदरों की तो बात ही निराली,  चश्मा छींनकर फ्रूटी मांगते हैं।  भिखारी बनाकर हमें नचाते,  पर अपनी बात जरूर मनवाते हैं।  हास्य परिहास की ये बात नहीं मित्रों,  ये वृंदावन की अद्भुत सच्चाई है।  जिसने जिया इस आनंद को दिल से,  उसके मन में बस राधेराधे समाई है उसके मन में बस राधेराधे समाई है।  प्रेषक - दीप्ति स...

बचपन एक सुंदर अहसास (कविता)

बचपन एक सुंदर अहसास और एक ऐसी अवस्था है जो अनेक रंगों से भरी हुई होती है| जहाँ माँ बाप, दादा दादी, बड़े छोटों का स्नेह न केवल उस बचपन को सुरक्षा व गति देता है वरन उस बचपन को अनेक संस्कारों से पोषित भी करता है| मौज़ मस्ती, पड़ना- लिखना, खेलना- कूदना, खेल- खेल में अनेक चीजों को सीखना, अपनी जिद मनवाना, नई नई चीजों की फरमाइश करना इत्यादि| यह सब बचपन के वो खुबसूरत पल हैं जो व्यक्ति को बड़े होने पर बार बार बचपन की यादों में ले जाते हैं और ये कहने पर मजबूर करते है कि काश वे बचपन के दिन दोबारा लोट आयें या काश मैं उन लम्हों को दोबारा जी सकता इत्यादि| बचपन वो अल्हड़ अवस्था है जिसमें लाख गलत कार्य करने पर मां बाप की थोड़ी सी नाराज़गी, डांट व मार खाने के बाद भी  बच्चे अपने मां बाप और प्रियजनों से लिपटे रहते हैं क्योंकि इस अवस्था में उनका अहं उस स्तर का विकसित नहीं हो पाता है जिसकी वजह से बच्चे अपने मां बाप, दादा दादी, बहन भाई से बात करना छोड़ दे, उनसे नाता तोड़ दें| तभी अक्सर प्रौणा अवस्था में पहुँचते ही यह कहते हुए सुना जाता है कि अगर जिंदगी खुशहाल बितानी है तो बच्चों से सीखो क्योंकि बच्चे मन...

जीवन और जिन्दगी का तालमेल

जब कभी जीवन या जिन्दगी की बात होती है तो कुछ लोग दोनों को एक ही मानते हैं पर गहराई से देखने पर दोनों के बीच एक बारीक सा भेद नजर आता है।  मेरे अनुसार " जीवन का तात्पर्य भगवान प्रदत्त उस प्राण सत्ता से है जिसको लेकर एक व्यक्ति जन्म लेता और जिसके साथ अपनी मृत्यु तक का सफर पूरा करता है।" व दूसरी तरफ हम यह भी कह सकते हैं जब व्यक्ति जन्म से लेकर मृत्यु तक के सफर में कई बार बड़े से बड़े हादसों में अपने आपको सुरक्षित पाता है तो यह कहते हुए सुना जाता है भगवान की दुआ से मेरी जान बच गयी या मुझे आज फिर से नया जीवन मिला है अतः इस वाक्य से इस बात की पुष्टी होती है कि जीवन भगवान द्वारा प्राणियों को दिया हुआ एक अनुपम उपहार है।  वहीं दूसरी ओर " जिन्दगी उस कर्म का नाम है । जिसको करने के लिए एक व्यक्ति इस संसार में जन्म लेता है तथा अपने समाज के साथ तालमेल बनाकर भिन्न भिन्न रूपों में अपने जन्म से लेकर मृत्यु तक के लंबे सफर में समय समय पर क्रियांवित करता है।"  अतः जीवन और जिन्दगी शब्द का अर्थ अलग होते हुए भी जिन्दगी, जीवन पर निर्भर है। जीवन यदि घी है तो जिन्दगी उसकी बाती है यदि जीवन खत्...

जीवन के सकारात्मक पक्ष को मनुष्य कैसे देखें?

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जीवन के सकारात्मक पक्ष को कैसे देखें? मनुष्य का जीवन अनेकों उतार-चढ़ावों सेेेेेेे भरा हुआ है। जिसमें मनुष्य को सुख के साथ-साथ हताशा व कभी निराशा का भी सामना करना पड़ता है। जीवन में आने वाली यह सभी परिस्थितियां मनुष्य के जीवन में उसकी परीक्षा का प्रमाण है कि इन परिस्थितियों में वह अपना मानसिक संतुलन कैसे बनाएं रखता है, या फिर टूटकर बिखर जाता है, या फिर एक मजबूत योद्धा की तरह इन परिस्थितियों से लड़कर अपने समाज व देश के सामने एक विशिष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। यदि हम अपने जीवन के आसपास के समाज को देखें तो पाएंगे कि समाज में ऐसे कई लोग हैं। जो अपने आप में पूर्ण नहीं है। चाहे वह शारीरिक रूप से हों, मानसिक रुप से हों ,आर्थिक रुप से हो या फिर शैक्षिक रुप से हो परंतु उन्होने अपने जीवन में अपनी एक सकारात्मक सोच व कड़ी मेहनत के जरिए एक उच्च मुकाम पाया है व समाज व देश के सामने एक प्रेरणा बनकर जीवन के सकारात्मक पक्ष को कैसे देखें, इसकी राह लोगों को दिखाई है। इसका सबसे बढ़िया और सटीक उदाहरण हमारे देश के उभरते हुए प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र दामोदरदास मोदी जी हैं। जिन्होंने चाय बेचने से एक प्रध...

भाग्य और किस्मत में अंतर

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जीवन के विकास में मनुष्य के भाग्य और किस्मत  का अनूठा खेल बहुत मायने रखता है। कुछ लोग अपनी भाग्य और किस्मत दोनों को कोसते रहते हैं | वहीँ दूसरी ओर कुछ लोग इन दोनों में भेद करके सच टटोलने का प्रयास भी करते रहते हैं | जीवन में कई बार ऐसी घटनाये होती हैं जिनमे भाग्य और किस्मत के अनोखे और चमत्कारिक परिणामों को देखा व महसूस किया जा सकता है | तो क्या ये भाग्य और किस्मत दिखने वाले समानार्थी शब्द एक है या भिन्न, इसको समझना अति आवश्यक है |  भाग्य की परिभाषा  मेरे अनुसार " भाग्य मनुष्य के पूर्वजन्मों में किये गए अच्छे व् बुरे कार्यों का वो मिश्रित फल है जिसको साथ लेकर मनुष्य दोबारा से इस नश्वर संसार में जन्म लेता है |"    किस्मत की परिभाषा  मेरे अनुसार " किस्मत मनुष्य के वर्तमान जन्म में किये जा रहे अच्छे व् बुरे कर्मों का वो परिणाम है | जिसके द्वारा  मनुष्य अपनी वर्तमान जिंदगी में बहुत कुछ प्राप्त भी करता है और कभी कभी बहुत कुछ प्राप्त करने के बाबजूद गवा भी देता है |" अतः उपरोक्त दोनों परिभाषाओं से एक बात यह स्पष्ट है कि...

स्वतंत्रता दिवस का जश्न पर कविता

१५ अगस्त १९४७ का दिन,  यह जश्न है उस आज़ादी का।  जो मिली भारत को सैकड़ों प्रयासों से,  जब बजा बिगुल क्रांतिकारियों का।  जन जन में आक्रोश भरा था,  ब्रिटिश हुकूमत की जंजीरों से।  पर मन में विश्वास अडिग था,  मुक्त होना है हमें इन जंजीरों से | चाहें हिंसा हो या फिर अहिंसा, | हर मार्ग को हम अपनायेगे | अपनी भारत की माटी से,  इन फिरंगियों को मार भगायेंगे | यही देशप्रेम का जज्बा लेकर,  जब कूदे स्वतंत्रता के संग्राम में | न कोड़े देखे, न सलाखें देखी,  चढ़ गए फांसी के तख्ते पर | हर रोम रोम में, हर साँस साँस में,  उनके बस, इंकलाब की आग थी | अपनी मातृभूमि से प्यारी मां जैसी,  तब कोई मां न, उनके पास थी |  ऐसे विचारों के चलते जब,  भारत में तिरंगा फहराया गया | देशप्रेम की सच्ची गाथाओं ने,  १५ अगस्त १९४७ को इतिहास रचाया | नमन है ऐसी देशभक्ति पर,  जिनके चलते हमने स्वतंत्रता पाई | स्वतंत्रता दिवस के ७९ वें जश्न पर,  पूरे देश को स्वतंत्रता दिवस की बधाई | प्रेषक - दीप्ति सोनी 

हम कृष्ण को भोग क्यों लगाते हैं

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हमारे भारत देश में हिंदू परंपरा के अनुसार पूजा पाठ के उपरांत भगवान को भेंट स्वरूप भोग लगाने की परंपरा रही है तथा यह परंपरा प्रदर्शित करती है भगवान के प्रति भक्त के निश्चल प्रेम,भाव व आस्था को जिसे उस भक्त ने इस संसार में रहकर सीखा है, अपनाया है और अनुसरण उपरांत हर दिन अपने भोजन का कुछ भाग अपने आराध्य के प्रति भक्तिभाव  pvjkसे समर्पित कर स्वयं को अनुग्रहित महसूस करता है।.अब प्रश्न उठता है कि भगवान कृष्ण को भोग क्यों लगाया जाता है? उन्होंने ही इस संसार में सब कुछ बनाया है। वही हर चीज के रचयिता हैं। उन्हीं से सब कुछ उत्पijnyन्न और उन्हीं में सब कुछ समाहित है। तब उनको भोग लगाने का क्या प्रयोजन रह जाता है? यह प्रश्न जितना ही गूढ़ है परंतु इसका उत्तर उतना ही मधुर, सुंदर, भावपूर्ण व धर्म के अनुसार है। यदि हम धर्म के दृष्टिकोण से  देखेंगे तो पाएंगे कि यह संसार एक कुटुंब की भांति है जिस प्रकार हम अपने परिवार व कुटुंब में रहकर अपने बड़ों, छोटों को व अपने प्रियजनों को उनको सम्मान देने के लिए उनकी पसंद के अनुसार पकवान बनाकर उनको समर्पित करते हैं तथा यह व्यवहार बड़ों के प्रति...