जीवन और जिन्दगी का तालमेल
जब कभी जीवन या जिन्दगी की बात होती है तो कुछ लोग दोनों को एक ही मानते हैं पर गहराई से देखने पर दोनों के बीच एक बारीक सा भेद नजर आता है।
मेरे अनुसार "जीवन का तात्पर्य भगवान प्रदत्त उस प्राण सत्ता से है जिसको लेकर एक व्यक्ति जन्म लेता और जिसके साथ अपनी मृत्यु तक का सफर पूरा करता है।"
व दूसरी तरफ हम यह भी कह सकते हैं जब व्यक्ति जन्म से लेकर मृत्यु तक के सफर में कई बार बड़े से बड़े हादसों में अपने आपको सुरक्षित पाता है तो यह कहते हुए सुना जाता है भगवान की दुआ से मेरी जान बच गयी या मुझे आज फिर से नया जीवन मिला है अतः इस वाक्य से इस बात की पुष्टी होती है कि जीवन भगवान द्वारा प्राणियों को दिया हुआ एक अनुपम उपहार है।
वहीं दूसरी ओर "जिन्दगी उस कर्म का नाम है । जिसको करने के लिए एक व्यक्ति इस संसार में जन्म लेता है तथा अपने समाज के साथ तालमेल बनाकर भिन्न भिन्न रूपों में अपने जन्म से लेकर मृत्यु तक के लंबे सफर में समय समय पर क्रियांवित करता है।"
अतः जीवन और जिन्दगी शब्द का अर्थ अलग होते हुए भी जिन्दगी, जीवन पर निर्भर है। जीवन यदि घी है तो जिन्दगी उसकी बाती है यदि जीवन खत्म तो जिन्दगी भी खत्म। जीवन भगवान प्रदत्त क्रियांवित होता है और जिन्दगी मनुष्य की चेतना व सोच प्रदत्त क्रियानवित होती है, जैसी वो अपनी सोच के साथ जिन्दगी जीना चाहता है। हमारा जीवन हमारे शरीर में है पर जिन्दगी का विस्तार मनुष्य की सोच व उसके आस पास के अनुकूल व प्रतिकूल वातावरण द्वारा निर्धारित होता है। कई बार लोगों को यह कहते हुए सुना है कि हम अपनी जिन्दगी सही ढंग से नहीं जी पा रहे हैं क्योंकि हमारे पास धन की कमी है या कई प्रकार की जिम्मेदारियां हैं या अनेक ऐसी बाधाएं हैं जिनको दूर किये बिना एक अच्छी जिन्दगी की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। क्या वास्तव में ऐसा है या हमारी सोच। नहीं ये वास्तव में हमारी सोच ही है क्योंकि सोच ही व्यक्ति की जिन्दगी के रथ की सारथी है जो व्यक्ति को समय समय पर अनेक विषमताओं के बावजूद आत्मविश्वास से भर कर जिन्दगी जीने के लिए बार बार प्रेरित करती है। संसार में ऐसे कई उदाहरण हैं जिनके पास धन की कमी थी, कुछ अपाहिज थे, कुछ अनेक जिम्मेदारियों के भार से दबे हुए थे। फिर भी उन्होंने अपनी सकारात्मक सोच व द्रण इक्षाशक्ति के बल पर न केवल अपनी जिन्दगी को जीया बल्कि दूसरे लोगों के लिये एक मिसाल पैदा की। वहीं दूसरी ओर जिन लोगों के पास उच्च शिक्षा, पैसा और शोहरत सब कुछ थी पर अपनी गलत और कुंठाग्रस्त सोच की वजह से कई ऐसे गलत निर्णय लिये जिनकी वजह से उनकी जिन्दगी एक अवसाद पूर्ण जिन्दगी की ओर अग्रसर हुई। माना कि आस पास का वातावरण जिन्दगी को प्रभावित करता है पर मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी सोच को उस स्तर का बनाये जिसकी वजह से वह न केवल अपनी जिन्दगी को प्रभावशाली बना सकता है वरन् अपने से जुड़े हर व्यक्ति की जिन्दगी को भी अपने मार्गदर्शन से रोशन कर सकता है। यहाँ सोच के स्तर से तात्पर्य उन सब बातों से है जिनको ध्यान में रखकर जीना जिन्दगी को खुशहाल बनाता है जैसे जीवन देने वाले अपने माता पिता की सेवा व अपने बड़े छोटों का ध्यान रखना , हर व्यक्ति के होठों पर अपनी अच्छी बातों और आदतों से मुस्कान ला देना तथा ईश्वर और स्वयं पर विश्वास रखते हुए अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होना इत्यादि, तभी आज हर व्यक्ति अपनी जिन्दगी में पूर्णता लाने व सफलता पाने के लिए किताबें पढ़ता है, गुरुवानी सुनता है और नये नये विकल्प तलाश करता है और यह सब उसकी सोच पर निर्भर करता है कि वो एक उल्लास भरी जिन्दगी जीये या अवसादग्रस्त तथा ये विकल्प भी तभी क्रियांवित हो पायेंगे जब व्यक्ति इन्हें अपनी सकरात्मक सोच से अपनाकर सही दिशा में कदम उठाये और अपनी जिन्दगी को प्रभावशाली बना पाये।
यहाँ मैंने जिन्दगी की अनगिनत परिभाषाओं को कविता के माध्यम से एक सूत्र में पिरोकर व्यक्त करने का प्रयास किया है जो इस प्रकार है।
यह सफर है जन्म से लेकर मृत्यु का,
उस सफर का दर्पण है जिन्दगी।
कुछ खट्टी, कुछ मीठी, कुछ सुहानी,
यादों का नाम है जिन्दगी।
हर सफर है अधूरा संघर्ष बिना,
उस संघर्ष का परिणाम है जिन्दगी।
दुःख, सुख, हानि, लाभ इन
कड़ियों का सार है जिन्दगी।
विषमताओं के बादल में,
अपनी पहचान बनाना है जिन्दगी।
रिश्तों की कसावट में जीकर,
धैर्य से संबंध निभाना है जिन्दगी।
है अनमोल जिन्दगी का हर लम्हा,
गर उसे एक अच्छी सोच के साथ जिया जाये।
जीवन की इन बड़ती सीडियों के हर पड़ाव पर,
सही कदम के साथ, आगे बड़ने का नाम है जिन्दगी।
लेखिका - दीप्ति सोनी
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