प्रात:कालीन द्रश्य (कविता)
भोर हुई उजाला फैला,
सूरज के आ जाने पर |
प्रकाश से चमक उठी धरती,
किरणों के फैल जाने पर |
विशाल अंबर में उड़ते पक्षी,
मस्त पवन में यूँ झूम रहे |
अपनी चहचाहट की ध्वनि से,
कानों में मिश्री घोल रहे |
हर लता, पेड़ और डाली धरा पर,
झूम झूम कर यूँ नाच रही |
सुंदर पुष्प खिलाकर वो मानों,
मन ही मन इठला रही |
कितना सुंदर दृश्य है प्रातः का,
इसमें बस खो जाएँ हम |
महसूस करें इसकी सुंदरता को,
अपने अंतर्मन को भी जगायें हम |
प्रेषक -दीप्ति सोनी
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