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चंदा मामा

मैं हूँ रात का उजाला,  चंदा मामा मेरा नाम | हर दिन मैं आकार बदलता,  मिटाता हूँ रात्रि का अंधकार | गोल गोल सा मैं बन जाता,  जब आती पूर्णमासी पास | अपनी सफेद चाँदनी बिखराकर,  रोशन करता मेरा प्रकाश | धरती का मैं भाई कहलाता,  बच्चों का मैं मामा हूँ | तारों के साथ हर रात मैं चमकता,  रात्रि को रोशन कर जाता हूँ |                                                                               (दीप्ति सोनी) 

सुखी परिवार

एक घर 🏡में एक घर 👨‍👩‍👧‍👦समाया,  जो कहलाता छोटा संसार है।  उस संसार का आनंद तब है,  जब हर प्राणी वहाँ का समझदार है।  संस्कारों के परिवेश में लिपटा,  मूल्यों और परम्पराओं में बंधा हुआ।  उचित जीवनशैली अपनाकर,  वह समाज में अडिग खडा हुआ।  हर सुख दुःख उसने साथ में देखे,  हर बीतते हुए लम्हों में।  उन लम्हों से सीख लेकर,  वह बड़ता जा रहा हर नये दौर में।  कई पीढ़ियों का साक्षी वो,  भूली बिसरी यादों का इतिहास है।  उन यादों की पगडंडियों पर चलकर,  वो कहलाता सुखी परिवार है।।             (दीप्ति सोनी) 

प्रकृति का उपहार बारिश (कविता)

⛈️🌧️⚡💧💦☔ बूंद बूंद होती बारिश भी,  प्रकृती का एक अनुपम उपहार है।  गर्मी मारे, शीतलता बरसाये,  मौसम बदलने का आगाज़ है।  मैं भी शांत कमल सी बैठी,  जब अपने घर के आंगन में।  बरबस अद्भुत हुआ हो जैसे,  बिजली चमकी हो बादल में।  घोर अंधकार छाया अंबर में,  जोरों सी गड़गडाहट हुई।  बूँदे टपकी, बारिश आई,  धरा भी मुस्कराने लगी। नई स्फुर्ति से खिल गया यह तन,  जब बैठी मैं खिड़की के सिरहाने पर।      माटी की सोंधी खुशबू से,  अभिभूत हो गया मेरा अंतर्मन।  प्रकृति का ये अनुपम उपहार,  सबके मन को भाता है।  धरती की यह प्यास बुझा कर,  सबको नवजीवन दे जाता है।           (दीप्ति सोनी) 

गंगा की महिमा (कविता)

तू बड़भागिनी पावन गंगे,  भारत का श्रृंगार है तू गंगे।  जो कोई गोते लगाए तुझमें,  हो भवसागर से पार वो गंगे।  युगों युगों से बह रही है तू,  ऐसी निश्चल धार है गंगे।  तेरी शीतलता को महसूस करे हर कोई,  जब कोई आये तेरी शरण में गंगे।  सुबह शाम होती, तेरी आरती,  दीपदान भी होते हैं तुझ में गंगे,  घर के मंदिर को भी शुशोभित करती,  अपनी धारा को समेट के गंगे।  गंगा दशहरा हर बार जब आये,  तेरी महिमा का गुणगान हो गंगे,  पाप नाशिनी, मोक्ष् दायिनी,  नवचेतना का कल्याण है तू गंगे।। 🙏            (दीप्ति सोनी)