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मन की बात ईश्वर के साथ

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  विविध जिज्ञासाओं की आंधी ने, कब मेरी सोच के आवेग को रोका था । हर क्षण हर पल विचारों की दुनिया में, मैंने अपनी मस्तिष्क  निरंतर झोंका था। मंथन हुआ जज्बातों का मन और दिल से, कभी मेरे अनुभवों, कभी मेरी शिक्षा ने मुझे राह दिखाई। मेरे संस्कारों ने मुझे मर्यादाओं में सीमित रखकर, मेरे मन में एक निर्णायक सोच बनाई। सोच यही कहती है बस, खुद पर पूर्ण विश्वास करो। कभी ना थको, कभी ना डरो, निरंतर तुम प्रयास करो। चौखट पर जलता दीपक भी, आंधी से लड़ने की ताकत रखता है। बुझते बुझते फिर से जल उठता, अपने आप पर पूर्ण भरोसा रखता है। शिथिल हो जाए मन मस्तिष्क तुम्हारा, कभी न बिखरो, कभी न टूटो तुम। उस परमात्मा की शरण में जाकर, फिर से अपने वजूद को टटोलो तुम। पाओगे वह असीम शक्ति, जिसका तुम्हें अंदाजा नहीं। एक बार आजमा के देखो मेरा यह अनुभव, क्या पता कल बन जाए यह अनुभव, आपका भी। लेखिका - दीप्ति सोनी