बचपन एक सुंदर अहसास (कविता)


बचपन एक सुंदर अहसास और एक ऐसी अवस्था है जो अनेक रंगों से भरी हुई होती है| जहाँ माँ बाप, दादा दादी, बड़े छोटों का स्नेह न केवल उस बचपन को सुरक्षा व गति देता है वरन उस बचपन को अनेक संस्कारों से पोषित भी करता है| मौज़ मस्ती, पड़ना- लिखना, खेलना- कूदना, खेल- खेल में अनेक चीजों को सीखना, अपनी जिद मनवाना, नई नई चीजों की फरमाइश करना इत्यादि| यह सब बचपन के वो खुबसूरत पल हैं जो व्यक्ति को बड़े होने पर बार बार बचपन की यादों में ले जाते हैं और ये कहने पर मजबूर करते है कि काश वे बचपन के दिन दोबारा लोट आयें या काश मैं उन लम्हों को दोबारा जी सकता इत्यादि| बचपन वो अल्हड़ अवस्था है जिसमें लाख गलत कार्य करने पर मां बाप की थोड़ी सी नाराज़गी, डांट व मार खाने के बाद भी  बच्चे अपने मां बाप और प्रियजनों से लिपटे रहते हैं क्योंकि इस अवस्था में उनका अहं उस स्तर का विकसित नहीं हो पाता है जिसकी वजह से बच्चे अपने मां बाप, दादा दादी, बहन भाई से बात करना छोड़ दे, उनसे नाता तोड़ दें| तभी अक्सर प्रौणा अवस्था में पहुँचते ही यह कहते हुए सुना जाता है कि अगर जिंदगी खुशहाल बितानी है तो बच्चों से सीखो क्योंकि बच्चे मन के सच्चे होते हैं और उनकी मासूमियत भरी मुस्कान और उनका अल्हड़ व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली होता है कि जो बड़ों को एक पूर्णता का अहसास कराता है और एक नई स्फुर्ति से भरकर फिर से एक बार बच्चा बनकर उनके साथ खेलने को मजबूर करता है और सच मानिये ये ही बचपन का सच्चा आकर्षण और खूबसूरती है जो सबको मोहित करती है| आज हिंदू धर्म में बचपन का सबसे सटीक उदाहरण द्वापर युग में जन्मे भगवान कृष्ण की बाल लीलालों से मिलता है, जिन्होंने एक तरफ न केवल अपनी क्रीड़ाओं, हठ, चतुराई, कौशल और मधुर मुस्कान से समस्त ब्रज वासियों का मन मोह लिया वरन प्रेम का सच्चा अर्थ क्या होता है इसका भी बोध कराया तथा वहीं दूसरी ओर एक सच्ची मित्रता की परिभाषा कृष्ण ने अपने बचपन के मित्र सुदामा के साथ निभाकर पूरे विश्व के सामने प्रस्तुत की। अतः इ hmसप्रकार इस बात से यह पुष्टि होती हैं कि बचपन की मित्रता जीवन का वो गहना है जो अमीरी गरीबी का भेद न करके जीवन के कई विषम मोडो पर काम आती है और सच्ची मित्रता की मिसाल पैदा करती है। अतः उस युग से निकल कर आज हम एक वैज्ञानिक युग में प्रवेश कर चुके है और आज इस वैज्ञानिक युग में बचपन को मनोविज्ञान में चार विकासात्मक चरणों में बाँटा गया है|
पहला शैशावस्था (चलना सीखना), 
प्रारंभिक बचपन  (खेलने की उम्र), 
मध्य बचपन    (स्कूली उम्र), 
किशोरावस्था ( व्यस्क संधि 12 से 18 तक की उम्र) 
अतः बचपन शैशवस्था और किशोरावस्था के बीच की अवधि को दर्शाता है| और यही वो अवस्था है जिसमें लड़कपन, खिलखिलाती हुई हँसी, लोग क्या कहेगें, जो दिल में है वो ही जुबाँन पर, खुल कर रो पाने की आजादी और पल भर में लड़ाई, पल भर में दोस्ती इन सबका समावेश होता है|
परंतु आज के इस बदलते तकनीकी युग में बच्चों का बचपन कहीं न कहीं गुम होता जा रहा है बचपन की अवस्था तो वो ही है पर एक नयी तरह की प्रेक्टिकल सोच ने बच्चों के बचपन की मानो सहजता ही छीन ली है| जिससे उनका बचपन सिर्फ और सिर्फ अपेक्षाओं और प्रतियोगिताओं का मात्र एक पिटारा बन कर रह गया है और कहीं न कहीं इस सोच के जिम्मेदार हम सब है और हमारे चारों ओर विकसित होता माहौल| तभी आज के बच्चे उस तरह का बचपन नहीं जी पा रहे हैं जिस पर उनका पूर्ण अधिकार है जो एक निराशा और चिंता का विषय है जिस पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है| 
मेरा मानना यह है कि बच्चे क्यारी का वो पौधा होतें है जो आसपास की जलवायु और समय समय पर सही खाद पानी (संस्कार) से धीरे धीरे बड़े होते जाते हैं और ऐसे में यह सोचना कि इन पौधों की माटी में कृतिम खाद (माटी से तात्पर्य बच्चों के कोमल मस्तिष्क से है) आदि डाल कर के जल्द ही एक पेड़ का आकार दे दिया जाये ताकि जल्द से जल्द इसके फलों का लाभ उठा सकें तो ऐसा व्यवहार और ऐसी सोच बहुत ही दयनीय है और ये बच्चों के बचपन के साथ खिलवाड हैं| जिस पर विचार करने की आवश्यकता है| यदि बालश्रम अपराध है उसी तरह बच्चों का बचपन छीनना भी किसी अपराध से कम नहीं है| इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे माँ बाप की अपेक्षाएं, पड़ाई का बेतहाशा दबाब, आधुनिक जीवन शैली इत्यादि। 
अतः अंत में यह ही कहूँगी कि बचपन वो महकता हुआ रंग बिरंगा फूल है जो खिलखिलता हुआ ही अच्छा लगता है| उसकी खिलखिलाहट बरकरार रहे ऐसा हम सभी को प्रयास करना चाहिए|
बचपन उम्र की सभी अवस्थाओं में श्रेष्ठ माना जाता है और इसी रंग बिरंगे विविधता पूर्ण बचपन को याद दिलाती एक कविता इसप्रकार है। 

वो सुंदर सा प्यारा सा बचपन, 
खेल, खिलौने, गुड़ियों का बचपन। 
अल्हड़ मित्रों की लंबी टोली में, 
हँसता, खिलखिलता, शैतानियों का बचपन। 

तुतलाती तोतली बोली में, 
ख्यालों को शब्द मिल जाने का बचपन। 
दादा - दादी की रोचक कहानियों में, 
किस्सों का अंबार है बचपन। 

बारिश की तेज बौछारों में, 
जोरदार हुड़दंग मचाता बचपन। 
भरे हुए पानी के गड्डों में, 
कागज की नाव तैराता बचपन। 

है बचपन सबका अपना अपना, 
बेतहाशा सुंदर यादों का बचपन। 
जब जब उन यादों के पीछे जाते, 
खुद को खुद से मिलाता बचपन। 


लेखिका- दीप्ति सोनी


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