भक्ति और प्रेम में अंतर
मानव जीवन को सुखमय और आनंदमय बनाने में प्रेम और भक्ति का विशेष योगदान रहा है तथा किसी भी परिस्थिति में इन दोनों के बिना जीवन अधूरा है | तो क्या ये दोनों शब्द एक हैं या अलग | इसको समझना अति आवश्यक है | भक्ति कि परिभाषा मेरे अनुसार "भक्ति उस सेवा भाव का नाम है जिसमे पवित्र, निश्छल प्रेम और अटूट श्रद्धा का वास होता है अर्थात प्रेम और श्रद्धा के योग को भक्ति कहते हैं | " जब व्यक्ति अपने जीवन में किसी अन्य व्यक्ति ,ईश्वर , निर्जीव वस्तु तथा स्थान के प्रति अपना निस्वार्थ प्रेम, विशवास और अटूट श्रद्धा रखता है वहाँ सहसा ही भक्ति की अविरल धारा बहती है | जैसे कि मनुष्य ने ईश्वर को कभी नहीं देखा है परन्तु वह अपनी साँसों में , वायु में व् इस पृथ्वी के हर कण कण में उस सूक्ष्म परन्तु विराट शक्ति को महसूस करता है तथा अपने अपने धर्म के अनुसार अपने इष्ट का पूजन, भजन व् ध्यान करता है , उसका हर पल स्मरण करता है तथा जो भी वह मन ,वचन और कर्म से उसके लिए कर सकता है वो सदैव करने का प्रयास भी करता रहता है और अपने आपको सौभाग्यशाली समझता है | यह भक्ति शब्द अपने आप में...