कोरोना बनाम प्रकृति (कविता)
बहुत दिन हो गये, बाहर देखे हुए, अपनों को भीड़ में खोते हुए। समय ने बदल दी रफ्तार हमारी, कोरोना ले गया आजादी हमारी। जब महत्वकांक्षि मानस ने, प्रकृति के सुगम तारों को छेड़ा था। अपनी माँ का सुख- शांति, चैन भी, उससे छीना था। क्योँ भूल गए की ये प्रकृति माँ है हमारी, गर नाराज हो गयी तो कहर ढायेगी भारी। अपनी आज़ादी पाने के लिए, जब छीनेगी आज़ादी हमारी। दे जायेगी एक प्रबल संदेश जो रहेगा सदा जनहित में जारी। प्रकृति की गोद में बैठे हो, सदा उसका आदर करो। करो उसकी हर इक चीज से प्यार, कभी उसका निरादर न करो। जीवन और मृत्यु के बीच की कड़ी को, सदा परअहिंसा, धर्म, सात्विकता और श्रेष्ठ भावनाओं के साथ जियो। प्रकृति कितनी सुंदर है, सदा इसका आभास करो, यह घातक विध्वंश दोबारा न देखना पड़े, ऐसा तुम प्रयास करो। सात्विकता को जीवन में अपनाकर, इस महामारी का नाश करो। जियो और जीने दो की इस पंक्ति को, फिर से एक बार चरितार्थ करो। (दीप्ति सोनी)