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जून 13, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सरदार मिल्खा सिंह को भावभीनी श्रद्धांजलि(कविता)

दौड़ में थी तूफानी रफ़्तार,  शरीर में स्फुर्ति का बल था।  दिल में थी देश प्रेम की चाहत,  आँखों में बस जीत का जुनून था।  वो सच्चे धावक, सच्चे सैनिक,  वो लम्बी रेस के तेज योद्धा थे।  नाम उनका सरदार मिल्खा सिंह,  वो खेल जगत का सच्चा हीरा थे।  बटवारे का दंश झेलकर जिसने,  हर मुश्किल बंधाओं को रौंधा था।  लक्ष्य साधकर मंजिल को छूना,  उनके व्यक्तित्व का ये खास गुण था।  आखिरी नमन आपको फ्लाईंग सिख, आप सच में नौजवानों की प्रेरणा थे।  चुस्ती, फुर्ती, बलिदान की सच्ची मूरत,  आप भारत का अविस्मरणीय गौरव थे।             !!ओम शांति ओम!!  प्रेषक- दीप्ति सोनी

योग का अर्थ और उसका महत्व

योग का अर्थ "  योग एक ऐसी गूढ़ साधना और प्रक्रिया है जो शारीरिक,मानसिक और आध्यात्मिक रूप से पूरे शरीर को एकाग्रचित् होकर जोड़ने का प्रयास करती है। अर्थात योग का अर्थ है जोड़ना या जुड़ना।" अब प्रश्न यह उठता है कि योग की उत्पति किसने की और इसके संस्थापक कौन हैं।  योग के संस्थापक आदियोगी शिव को माना गया है। जो न केवल एक आलौकिक साधना में लीन रहते है। बल्कि उनकी नृत्य की शैली में भी एक विशिष्ट योग मुद्रा की झलक देखने को मिलती है। आज से लाखों वर्ष पूर्व मनुष्य अपनी इन्द्रियों को नियंत्रित करके और योग साधना में लीन होकर अपने शरीर की आत्मा को परमात्मा से इस तरह से जोड़ लेते थे कि उस पर किसी बाहरी पदार्थ का असर नहीं होता था। तब यह ही योग हजारों वर्षों की तपस्या कहलाता था। परंतु आज वर्तमान समय में योग की विचारधारा में बदलाव आया है और इस विचारधारा में बदलाव लाया आज से २०० ईसा पूर्व योग सूत्र के रचयिता महर्षि पतंजलि ने जिन्होंने योग को नई दिशा दी। पतंजलि ने योग के १९५ सूत्रों को प्रतिपादित किया है पतंजलि ही पहले और एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने योग को आस्था, अंधविश्वास और धर्म से बाहर ...

सेब पर कविता ( poem on Apple🍎🍏)

कभी हरा, तो कभी लाल,  पर अंदर से मैं हूँ सफेद।  पौष्टिकता से भरा हुआ,  सबका प्यारा मैं हूँ सेब।  जो कोई मुझको नियमित खाता,  बीमारियों को वह दूर भगाता।  रोगों से लड़ने की शक्ति मैं देता,  जिसको मेरा स्वाद बहुत भाता।  फाइबर, विटामिन से भरा हुआ,  मैं सबके लिए बहुत खास हूँ।  बारोहों महीने बाजार में मिलता,  मैं प्रकृति का सुंदर उपहार हूँ।  प्रेषक- दीप्ति सोनी

मदर्स डे पर कविता

फरिश्ता कहूँ ,या कोई ममता की मूरत,  जिसको भगवान ने फ़ुरसत से तराशा है।  वो और कोई नहीं, वो प्यारी माँ है मेरी,  जो रखती सदैव हमपर, अपने आँचल की छाया है।  मेरे खून का हर कतरा कतरा,  तेरा सदैव आभारी है माँ।  तू है तो , आज मैं हूँ।  वरना "मैं" का अस्तित्व कहाँ।  शादी होकर, हो गयी पराई,  मैं भी बन गयी दो बच्चों की माँ।  मेरे लाड में वो बात नहीं शायद,  जो तेरे लाड में, अब भी है माँ।  वो फिकर वो चिंता तेरी,  अब भी रहती जारी है।  बच्चों से यदि बात न करले,  तेरे मन में आ जाती उदासी है।  तेरी प्यार भरी ममता से मैंने,  जो भी अब तक पाया है।  वो ममता नहीं सिर्फ, संस्कार है तेरे,  जिनमें ढलकर, मुझे जिंदगी जीना आया है।  परवाह नहीं मुझे अन्य उपहारों की,  तू मेरे लिए बहुत खास है माँ।  तू मुझसे दूर रहे, या फिर पास में मेरे,  बस तेरा होना ,मेरे लिए काफी है माँ।  प्रेषक- दीप्ति सोनी