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मई 10, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मजदूरों का पलायन 😢

मजदूर चले पलायन की य़ात्रा,  नहीं मिला कोई संगी सहारा | भूखे पेट कर रहे, लम्बी य़ात्रा ,  बस चलते जा रहे अपनी य़ात्रा | सर पर सामान व बच्चों को थामे,  बेबसी के मारे , वो लाचारे | आँखो में आँसू , मन मैं चुभन,  डगमगा रही है मानो, जीवन की डगर | ना जेब मैं पैसे, ना सर पे छत ,  समय ने दिखाया ये बेदर्दी का सच | थमी सी ज़िन्दगी को पलायन से चला रहे हैं,  कुछ हो रहे चोटिल तो कुछ बेमौत मारे जा रहे हैं | ऐसा दृश्य देखकर मन बार बार यही पूछता है , हर मजदूर वर्ग का क्या ये ही हश्र होता है ?😢

खोली गई मधुशालाएं

आज ऐसा कया हुआ जो,  सड़कों पर हलचल मच गई लाॅकडाउन का पालन करती सडकें,  आज फिर लम्बी कतारों से सज गई | मंदिर, मस्जिद खुल न सके,  जब खोली गई मधुशालाएं,  सैलाब उमड़ कर जा पहुँचा वहाँ,  ताक पर रख सबकी जानें | अर्थ व्यवस्था का उल्हाना देने वालों,  कयो नासमझी करते हो,  अपने निजी स्वार्थ के लिए नये आदेश गणते हो | तरस आता है ऐसे लोगों पर,  जिनका कोई सरोकार नहीं,  वतन को खतरे में डालना,  इससे बड़ा कोई पाप नहीं |

Mother's Day (कविता)

मेरी कलम से,  मां की क्या मैं परिभाषा दूँ,  मां तो केवल मां होती है | जीवन की हर राह दिखाये ,  वो ही तो सच्ची गुरू होती है l  कटता ज़िसका हर पल पल,  बच्चों की फरमाइशों मैं,  कभीं ना रुकती, कभी ना थकती,  घर का वह स्तंभ होती है | कोई ना इसके समक्ष ठहरता,  निस्वार्थ प्यार -भाव और करूणा मैं,  वो तो समुद्र सा अस्तित्व रखती ,  अपने प्यार  और दुलार मैं | धैर्य की है वो प्रतीमूरत ,  बच्चों की है वो, शीतल छाया  ऐस छाया के आँचल मैं,  बच्चों का घर संसार समाया| मां की महिमा के आगे,  सब वेद पुराण नतमस्तक हैं | ज़िसके चरणों मैं बसता स्वर्ग है,  बाकी के वैभव फीके हैं | मां के गुणों की क्या तारीफ करूँ,  ज़िसमें हर ऋतुओं के स्वाद समाये हैं| ऐसे चरणों को करती हूँ वंदन,  ज़िसके कारण हम इस दुनिया मैं आये हैं| बना रहे सदा आशिर्वाद तुमहारा मां  हर सुख - दुख के साये मैं| कभी ना रुकूँ, कभी ना डरु  इस जीवन की मझधार मैं| प्रेषक - दीप्ति सोनी