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आधुनिकता बनाम प्रकृति (कविता)

आधुनिकता की इस शैली ने,  प्रकृति को ऐसा विक्षिप्त किया।  कहीं धुँए के खूब गुबार उड़ाये,  कहीं प्लास्टिक का अंबार किया।  न ही धरती, न ही अंबर,  अब न ही पानी शुद्ध रहा।  बहती प्राणवायु के बहाव में,  अब शुद्ध वायु का भी अभाव रहा।  जंगल काटे, घरौंदे बाटें,  भूमि को भी बेजान किया।  पीठ थपथपाकर कहता हर पल,  हमने विज्ञान में बहुत नाम किया।  दौड़ रही है दुनिया सारी,  मसीहा बन जाने की चाहत में।  पर बार बार बेबस पड़ जाती,  प्राकृतिक आपदा की ताकत से।  मसीहा वो है ,जिसने ये श्रष्टि बनायी, एक माटी को जीवन दान दिया।  भावनाओं का सैलाब उडेला उसमें,  इस श्रष्टि का सुगम संचार किया।  सुगम संचार को रौंधा हमने,  इंसानियत भी अब ताक पर रख डाली। फिर क्यों कहते हो दुनिया वालों,  ऐसी घड़ी क्यों आन पड़ी।  ऐसी घड़ी क्यों.......... पड़ी।  प्रेषक- दीप्ति सोनी