हास्य कविता - वृंदावन की अद्भुत सच्चाई
हास्य कविता राधे राधे बोलते हुए सब, वृंदावन को भागे आते हैं। मंदिर के बाहर आते ही सब, कुछ खाने को ललचाते हैं। भल्ले, टिकिया, चाट- पकौड़ी, ढोकला, लस्सी और रसमलाई। कभी कचौरी, जलेबी की खुशबू से, जीभ निकलकर घुटनों तक आई। पेट भर जाता पर मन नहीं भरता, इन स्वादिष्ट व्यंजनों की भरमार से। भर भर दोने मिनटों में, सफाचट हो जाते, पहले मैं, पहले मैं की तकरार में। ठुस्सम ठुस्सा इस भीड़ के कारण, हम कहीं से कहीं पहुँच जाते हैं। क्या लेना था, कहाँ रुकना था। बस जोर जोर से चिल्लाते हैं। बंदरों की तो बात ही निराली, चश्मा छींनकर फ्रूटी मांगते हैं। भिखारी बनाकर हमें नचाते, पर अपनी बात जरूर मनवाते हैं। हास्य परिहास की ये बात नहीं मित्रों, ये वृंदावन की अद्भुत सच्चाई है। जिसने जिया इस आनंद को दिल से, उसके मन में बस राधेराधे समाई है उसके मन में बस राधेराधे समाई है। प्रेषक - दीप्ति स...