अनुभव का अर्थ और उसकी महत्वता



जीवन में अक्सर हम अनुभवों से जुड़ी बातें कहते या सुनते हैं या फिर कभी कभी अपने अनुभव दूसरों से समय समय पर साझा करते हैं। तो क्या है इस अनुभव का अर्थ और उसकी महत्वता। इस बात पर थोड़ा प्रकाश डालने की आवश्यकता है। 

मेरे अनुसार " किसी कार्य व व्यवहार को निरंतर प्रयोग करते रहने व उस कार्य और व्यवहार की परीक्षा के परिणाम स्वरूप प्राप्त ज्ञान को अनुभव  कहते हैं। "

अनुभव किसी भी इंसान के जीवन की अमूल्य निधि होते हैं। जिनके बल पर एक इंसान अपनी जिंदगी में आगे बढ़ता चला जाता है और समाज में अपनी एक नई छवि बनाने में सक्षम हो पाता है। अतः यह कहना गलत न होगा कि अनुभव ही एक व्यक्ति के व्यक्तित्व को किसी दूसरे व्यक्ति के व्यक्तित्व से अलग करते हैं। जीवन में चाहे धन, मित्र, रिश्तेदार, और समाज व्यक्ति के काम आये न आये परन्तु अच्छा और बुरा अनुभव ही इंसान की जिंदगी में हमेशा काम में आता है। अनुभव इंसान का वो रथ है जिसका सारथी स्वंय मनुष्य है और जिसके साथ एक मनुष्य बहुत कुछ हाँसिल कर सकता है और जीवन में अच्छे ,बुरे का भेद भी समझ पाता  है। अनुभव ही प्रगति व समाज को जोड़ने का कार्य करता है। जैसे कि बहुत से व्यक्ति अपने अनुभव व महेनत के बल पर अपनी अपनी  रुचि के क्षेत्र में आगे बढ़ते जाते हैं और वह समाज जिसमें अनेक धर्मो के लोग सम्मलित हैं उन सबको एक साथ जोड़ने का कार्य करते हैं। ऐसे अनेको उदाहरण हैं जैसे खेल जगत में श्रेष्ठ नाम सचिन तेंदुलकर हों, हिन्दी जगत के श्रेष्ठ और युवा दिलों की धड़कन कहे जाने वाले कुमार विश्वास हों, अभिनय की क्षमता का स्तम्भ कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन हों, या फिर भारतीय कुकिंग क्षेत्र में जाना माना नाम संजीव कपूर हों इत्यादि आज असंख्य लोग इनको देखना ,सुनना और इनके अनुभवों से सीख लेना पसंद करते हैं जिन्हें आज की भाषा में followers कहते हैं तथा ये followers अनेको धर्म ,जाति ,समाज व् संस्कृति से जुड़े होते हैं अतः इस बात से यह पुष्टि होती है कि अनुभवी व्यक्ति न केवल अपनी प्रगति करता है वरन वह समाज को जोड़ने का कार्य भी करता है अब यहीं से यह प्रश्न उठता है कि क्या किसी मंजिल पर पहुँचने के सभी के अनुभव सामान होते हैं या फिर अलग तो इस प्रश्न का उत्तर होगा अलग - अलग । क्योंकि सभी के अनुभव उसके अपने पारिवारिक ,सामाजिक, शैक्षिक व् असंख्य मुश्किलों, संघर्षों  और उतार चड़ाव का सामना करने के उपरान्त निर्मित होते हैं या फिर हम यह कह सकते हैं कि अनुभव की प्राप्ति हमें कई प्रकार से होती है । 
१-  पुस्तकों एवं शिक्षा द्वारा 
२-  स्वयं किये गए संघर्षों द्वारा 
३-  दैनिक प्रयासों के द्वारा
४-  जीभ के स्वाद द्वारा
५-  एक उम्र के पड़ाव पर
६-  दूसरों के अच्छे -बुरे व्यवाहर के आंकलन द्वारा
७- समाज के मान्य अनुभवशाली इंसानों द्वारा समझाए जाने पर। 

हिंदी में एक कहावत है " जिसके पैर में पड़ी न विवाई वो क्या जाने पीर पराई। " 
अर्थात जिस व्यक्ति ने स्वयं मुसीबतों का सामना न किया हो वो दूसरों के दर्द को अनुभव नहीं कर सकता है। "

हम जीवन में किसी की नक़ल तो कर सकते हैं परन्तु वास्तव में इन अनुभवों को महसूस करने के लिए हमें स्वयं उन जैसे अनुभवों के अलग अलग परिस्तिथियों से होकर  गुजरना पड़ेगा जैसे कि उदाहरण के तौर पर आज वालीवुड में अलग अलग शीर्षकों पर अलग अलग फ़िल्में बनायीं जाती हैं। उसके लिए एक अभिनेता या अभिनेत्री उस फिल्म से सम्बंधित अभिनय को जीने के लिए उस किरदार से जुडी अनेक बातों, कार्यों को पहले सीखतें है और उनसे जुड़े अनुभवों को महसूस करके कैमरे के सामने प्रस्तुत करते हैं पर ये जो अनुभव हैं ये केवल नक़ल मात्रा हैं जो किसी व्यक्ति विशेष का व्यक्तित्व प्रस्तुत करते हैं। परंतु अभिनेता या अभिनेत्री के लिए वास्तविक अनुभव वह है जो उन्होंने पूरी फिल्म बनाने के दौरान प्राप्त किया है और जो उन्हें , उनके अभिनय क्षेत्र में न केवल आगे बढ़ने में सहायक होता है । वरन उस अभिनय क्षेत्र में उनकी एक अलग पहचान बनाने में भी सहयोग देता है।  
तभी जीवन में कई व्यक्तियों को अपनी अपनी रूचि के अनुसार अलग अलग क्षेत्र में कार्य करते देखा है पर उस क्षेत्र विशेष तक पहुंचने का सबका अनुभव असमान ही होता है। अतः अलग अलग अनुभवों के कारण ही कुछ व्यक्ति एक ही क्षेत्र में  बहुत आगे तक बढ़ जाते है और कुछ धीमी गति से आगे बढ़ते है।    

मनुष्य का ज्ञान दो भागो में बंटा  हुआ है 
१ > स्मृति ज्ञान 
२ > अनुभव ज्ञान 

जो ज्ञान संस्कारों से प्राप्त होता है। उसे स्मृति ज्ञान कहते हैं तथा जो ज्ञान विभिन्न समस्याओं के समाधान उपरान्त प्राप्त होता है। उसे अनुभव ज्ञान कहते है। अतः दोनों ही ज्ञान मनुष्य को जीवन में कदम कदम पर सही निर्णय लेने में सहायता करते हैं। 
शैक्षिक ज्ञान अहंकार को जन्म दे सकता है परन्तु अनुभव ज्ञान सदैव विनम्र होता है जैसे कि बहुत से लोग बहुत शिक्षित होते है। उन्हें किताबी ज्ञान बहुत होता है।परन्तु यह जरुरी नहीं है कि उनका अनुभवी ज्ञान भी उतना ही उम्दा हो। कभी कभी कुछ लोग शिक्षित होते हुए भी उनमे अनुभवों का अभाव होता है और वहीँ दूसरी ओर एक अनपढ़ व्यक्ति में  भी किताबी ज्ञान न होने के बाबजूद वह अच्छा अनुभवी ज्ञान रख सकता है और जो उसके स्वयं के द्वारा विभिन्न उतार चढ़ावों के द्वारा सीखा हुआ होता है। 
अतः हम कह सकते है कि अनुभव ज्ञान ही वो सच्चा ज्ञान है जिसको प्राप्त करने के लिए सर्वप्रथम क्रियाशील होना बहुत जरुरी है। तभी व्यक्ति बहुत कुछ सीख पाता है और अपने  जीवन में विभिन्न मोड़ो पर सही, गलत को जानकार निर्णय लेने और समाज अनुकूल व्यहवार करने में सक्षम हो पाता है।   

रीटा मई ब्राउन के अनुसार " अच्छे निर्णय लेना अनुभव से आता है और अनुभव, बुरे निर्णय लेने से आता है। "

अतः अनुभव जीवन की अमुल्य निधि जिन्हें प्राप्त करने के लिए मनुष्य को ज्यादा से ज्यादा क्रियाशील होना चाहिए ,अनुभवी लोगों के साथ समय बिताना चाहिए , और दूसरों के साथ अपने अनुभवों को बाँटते चलना चाहिए। 

लेखिका- दीप्ति सोनी

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