भाग्य और किस्मत में अंतर


जीवन के विकास में मनुष्य के भाग्य और किस्मत  का अनूठा खेल बहुत मायने रखता है। कुछ लोग अपनी भाग्य और किस्मत दोनों को कोसते रहते हैं | वहीँ दूसरी ओर कुछ लोग इन दोनों में भेद करके सच टटोलने का प्रयास भी करते रहते हैं | जीवन में कई बार ऐसी घटनाये होती हैं जिनमे भाग्य और किस्मत के अनोखे और चमत्कारिक परिणामों को देखा व महसूस किया जा सकता है | तो क्या ये भाग्य और किस्मत दिखने वाले समानार्थी शब्द एक है या भिन्न, इसको समझना अति आवश्यक है | 
भाग्य की परिभाषा 

मेरे अनुसार " भाग्य मनुष्य के पूर्वजन्मों में किये गए अच्छे व् बुरे कार्यों का वो मिश्रित फल है जिसको साथ लेकर मनुष्य दोबारा से इस नश्वर संसार में जन्म लेता है |"   

किस्मत की परिभाषा 

मेरे अनुसार "किस्मत मनुष्य के वर्तमान जन्म में किये जा रहे अच्छे व् बुरे कर्मों का वो परिणाम है | जिसके द्वारा  मनुष्य अपनी वर्तमान जिंदगी में बहुत कुछ प्राप्त भी करता है और कभी कभी बहुत कुछ प्राप्त करने के बाबजूद गवा भी देता है |"

अतः उपरोक्त दोनों परिभाषाओं से एक बात यह स्पष्ट है कि दोनों परिभाषाओं में कर्म की प्रधानता को ही श्रेष्ठ माना गया है | अर्थात मनुष्य के कर्म ही वो प्रबल शक्ति हैं जिनके कारण जन्म के समय प्राप्त उसके भाग्य और जिंदगी को अच्छे ढंग से व्यतीत करने के लिए उसके कर्मों द्वारा उसकी किस्मत का निर्धारण होता है | भाग्य और किस्मत मनुष्य के जीवन के वो दो अभिन्न अंग हैं जिनको उसके जीवन से अलग नहीं किया जा सकता है | इसको इस तरह भी समझा जा सकता है कि किस्मत शरीर है तो भाग्य उसकी परछाईं, जो मरते दम  तक उसका पीछा नहीं छोड़ती है | अक्सर हम अपने आस पास यह कहते हुए सुनते हैं कि अमुक बच्चा बहुत ही भाग्यशाली हुआ है कि इसके जन्म लेते ही घर में सब कुछ शुभ ही शुभ हो रहा है तो हम कह सकते हैं कि यह सब बच्चे का भाग्य ही है जिससे वह स्वयं भी अंजान है। 
मनुष्य काला, गोरा , अमीरी -गरीबी ,अच्छा कुल ,अच्छे रिश्तेदार , स्वस्थ -अस्वस्थ शरीर ये सब कुछ अपने भाग्य से प्राप्त करता है |  तथा इस तरह के भाग्य को प्राप्त करके मनुष्य को अपनी किस्मत कैसे चमकानी है यह मनुष्य द्वारा उसके वर्तमान में किये गये कर्मों पर निर्भर करता है। अर्थात यदि एक व्यक्ति अपने नियत भाग्यनुसार एक उच्च कुल में जन्म लेकर भी अच्छे कर्म न करे तो वह एक दिन अपना यश, कीर्ति, वैभव आदि सब कुछ गवा देता है। वहीं दूसरी ओर एक व्यक्ति गरीब घर में भी जन्म लेकर भी सफलता की उन ऊँचाइयों को छूता है जिसे प्राप्त करना सबके बस की बात नहीं होती है। ऐसे कई उदाहरण हैं जो इस बात को स्पष्ट करते हैं। जैसे हमारे भारत के पूर्व राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम, धीरूभाई अंबानी, अनिल अंबानी, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदीजी इत्यादि। जिन्होंने एक साधारण से घर में, एक साधारण सी छवि के साथ जन्म लिया परन्तु अपने सतत् प्रयासों और अच्छे कर्मों से अपनी किस्मत को वो चमकाया जिसका प्रमाण पूरी दुनिया के सामने है। यह ही है सच्चे अर्थों में भाग्य और किस्मत का खेल। कई बार जीवन में ऐसी कई घटनाएं होती हैं जिनसे व्यक्ति यह जानने की कोशिश करता है कि जब उसने किसी के साथ कुछ गलत नहीं किया तो उसके साथ अच्छा या बुरा क्यों हो रहा है या उसके हर कार्यो में इतनी परेशानियाँ क्यों आ रही हैं। यह सब उसके भाग्य और वर्तमान में किये गए अच्छे कर्मों के द्वारा अन्य लोगों से मिले आशीर्वाद और दुआओं का तथा गलत कार्यों के लिए अन्य लोगों द्वारा तिरस्कार पूर्वक अंतर्मन से दिये गये कटु वचनों का ही प्रतिफल होता है। तभी कई बार लोगों को यह कहते हुए सुना जाता है कि आज मेरे अच्छे कर्मों और लोगों की दुआओं से मेरी नई जिंदगी हुई है या मैंने अच्छी सफलता प्राप्त की है। या फिर आज मेरे भाग्य ने मेरा साथ नहीं दिया इत्यादि। कई बार मनुष्य को अपने भाग्य अनुसार माता पिता का सुख, अच्छा पति, अच्छी पत्नी, गुणवान बच्चे, अच्छे सगे संबंधी, अच्छी शिक्षा इत्यादि नहीं मिल पाती है तो क्या उनका जीवन और उनकी किस्मत खराब है। नहीं ऐसा नहीं है। मनुष्य इन सब चीजों को अपना नियत भाग्य समझकर अपना ही लेता है तथा अपने सतत कर्मों , पुरुषार्थ ,दान ,भक्ति आदि से न केवल अपने वर्तमान जीवन को खुशहाल बनाने का प्रयतन करता है बल्कि अपनी मृत्यु उपरांत नये जीवन में अच्छा भाग्य प्राप्त करने के लिए अपने अच्छे व बुरे कर्मों का लेखा जोखा भगवान के सामने भी प्रस्तुत करता है। अनेकों बार यह बात सुनने को मिलती है कि भाग्य के लिखे को कोई नहीं मिटा सकता | पर इस वाक्य में कितनी सच्चाई है | इस बात को एक उदाहरण के द्वारा भी समझा जा सकता है जैसे एक व्यक्ति को अपने पिता का पुश्तैनी घर उसे उसके भाग्य से मिला है  तो क्या वह उस पुराने घर में रहने के लिए विवश होगा? नहीं ऐसा नहीं है वह अपने उस घर को वर्तमान परिस्तिथियों और अपनी सुख सुविधाओं का ध्यान रखते हुए उसमे कुछ अपनी  रूचि के अनुसार परिवर्तन करवा सकता है जैसे वह उस घर के कमरे तुड़वा करके एक बड़ा कमरा बनवा सकता है ,नई तरह की रसोई बनवा सकता है, नया पेंट करवा सकता है, नए तरह के टाइल्स लगवा सकता है इत्यादि| तो जो परिवर्तन उसने अपने घर में करवाए है ये उसके वर्तमान कर्म है और जो पुश्तैनी  घर उसे मिला था वह उसका भाग्य था | तो इस बात से यह पुष्टि होती है कि व्यक्ति अपने कर्मों से अपने लिखे भाग्य को भी बदलने की भी ताकत रखता है |  अतः जो लोग सब कुछ अपने भाग्य में लिखा समझकर कर्म करना छोड़ देते है वह न केवल अपने वर्तमान को खराब करते है वरन अपने भाग्य में लिखे अच्छे अवसरों को भी अपनी निष्क्रियता से गवा देते है |   

चाणक्य नीति के अनुसार " आयु, कर्म, धन, विद्या, मृत्यु ये पांच चीजें प्राणी के भाग्य में तभी लिख दी जाती हैं जब वह गर्भ में होता है। "

अतः यह कहना अनुचित न होगा कि "मनुष्य अपनी किस्मत व भाग्य का खुद ही निर्माता है।" भगवत गीता में भी भगवान् कृष्ण ने कहा है "कर्म करो फल की इक्षा मत करो | "इसलिए सनातन धर्म में व्यक्ति के कर्मों पर विशेष बल दिया गया है जो उसके भाग्य और किस्मत  दोनों का सारथी है। इसलिए मनुष्य को भाग्य की परवाह किये बगेर कर्म प्रधान होना चाहिए। 

लेखिका - दीप्ति सोनी


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