कोरोना का कहर (कविता)
मास्क बिके, सेनेटाइज़र भी बिके, बिक रही आक्सीजन भी अब मोल। कोरोना की इस भीषण सुनामी में, साँसें भी पड़ रही अब कमजोर। जगह जगह हाहाकार मचा रहा, मच रहा रुदन और कहीं शोर। सिस्टम भी लाचार बन पड़ा, जनता देखे अब किस ओर। ये इम्तहान की घड़ी है, या घड़ी है इस कालचक्र की। जो बच गया, समझो वही सिकंदर, वरना छूटती जा रही, अब हर आस भी। ये कभी सोचा किसी ने, ऐसा कैसे और क्यों हुआ। हवा भी दवा बन गयी, इंसान घर में क्यों कैद हुआ। कुछ गलत कर्म किये होंगे हमने शायद, जो आज सजा ऐसी पायी है। खुशनुमा इस धरती के आँगन में, इस मंजर ने ली अंगड़ाई है। जान है तो जहान है, ये तो सब बतियाते है। जिंदगी के लिए क्या है अनमोल, पर ये क्यों भूल जाते हैं। अब भी समय है, सोचो, समझो चेतना में आओ। प्रकृति कितनी अनमोल है, इस बात को अपने मन में ठहराओ। हम प्रकृति के दास है, प्रकृति हमारी दासी नहीं। करी थी जो हमने मनमानी, तभी दिखती नहीं खुशहाली कहीं।...