संस्कृति और सभ्यता में अंतर


मनुष्य के सम्पूर्ण विकास में उसकी संस्कृति और सभ्यता का विशेष  योगदान रहा है इसलिए हम सभी अपने जीवन में अनेकों बार संस्कृति और सभ्यता की बातें करते और सुनते  हैं | तो क्या है ये संस्कृति और सभ्यता ? क्या ये दोनों एक हैं या भिन्न ? इसको थोड़ा समझने की आवश्यकता है | 

सभ्यता [civilization ] और संस्कृति [culutre  ] मानवीय समाजिक जीवन की अमूल्य संपत्ति है जिसके कारण मानव को पशु से भिन्न समझा जाता है तथा सभ्यता, संस्कृति का विशेष अंग है | यद्यपि  इन दोनों को एक दूसरे से भिन्न नहीं किया जा सकता परन्तु इन दोनों के स्वरुप में भिन्नता देखी और समझी जा सकती है | 

सभ्यता और संस्कृति में अंतर 

  • सभ्यता से मनुष्य के भौतिक क्षेत्र की प्रगति सूचित होती है जबकि संस्कृति से मनुष्य की मानसिक क्षेत्र की प्रगति सूचित होती है | 
  • सभ्यता साधन है जबकि संस्कृति साध्य /साधना है | 
  • संस्कृति में गहराई होती है जबकि सभ्यता में गहराई का अभाव होता है | 
  • संस्कृति का सम्बन्ध व्यक्ति और समाज में निहित संस्कारों से होता है और उसका निवास व्यक्ति के  मस्तिष्क में होता है जबकि सभ्यता का सम्बन्ध व्यक्ति और समाज के बाह्य स्वरुप से है | 
  • सभ्यता के विकास की गति संस्कृति के विकास की गति से तीव्र होती है |
  • संस्कृति हमारे सामाजिक जीवन की उद्गम स्थली है जबकि सभ्यता इसके प्रवाह में सहायक उपकरण |   
  • सभ्यता का मापन किया जा सकता है परंतु संस्कृति का नहीं। 

पारिभाषिक रूप में जिसबर्ट के अनुसार " सभ्यता बताती है हमारे पास क्या है और संस्कृति यह बताती है कि हम क्या हैं | " 

इसी परिभाषा को विस्तार देते हुए मेरे अनुसार जब सृष्टि की रचना हुई तब भगवान् द्वारा निर्मित प्रकृति में मनुष्य द्वारा  निर्मित न संस्कृति थी और न सभ्यता | तब मनुष्य एक पशु के समान था। तब उसको ये ज्ञात नहीं था कि  उसके पास क्या है? और वह स्वयं में  क्या है? उसकी बुद्धि  एक कोरा कागज थी | उसके पास प्रकृति प्रदत्त साधन तो थे पर उनका उपयोग किस तरह किया जाता है इन बातों से वो अनिभिज्ञ था | धीरे -धीरे जब मनुष्य ने अपनी सोच के द्वारा समूह में रहकर खाना बनाने से लेकर अपने रहन सहन की क्रियाओं का विस्तार किया | तभी  से संस्कृति और सभ्यता की नींव रखी गयी | तभी से मनुष्य ने गुफाओं  से निकलकर अपने लिए कच्चे पक्के मकान बनाना सीखा , समाज का निर्माण किया तथा समाज में  रहकर किस तरह व्यवहार किया जाता है तथा उसमें रहने के क्या मूल्य और मानक हैं इन सबका विस्तार किया इत्यादि | अतः यह स्पष्ट है कि संस्कृति का तात्पर्य सूक्ष्मता से है जो दिखाई नहीं देती वरन महसूस की जाती है ,जो हमारी सोच द्वारा हमारे व्यहवहार में प्रतिलछित होती है और जो हमारे सामजिक जीवन की उदगम स्थली है | जिसमे किसी देश के संस्कार , भाषा, मूल्य , विचार, रचनात्मकता ,सृजनात्मकता, संगीत, साहित्य ,धर्म, दर्शन , कानून, विज्ञान ,राजनीति संस्थाओं  और रीती रिवाजों इत्यादि  का समावेश होता है  | वहीँ दूसरी ओर सभ्यता का तात्पर्य भौतिकता से है | जिसको हम देख सकते हैं उसकी दूसरी भौतिक वस्तुओं से तुलना कर सकते हैं तथा जो संस्कृति के प्रवाह में उपकरण का कार्य करती है इत्यादि | अतः हम ये कह सकते है कि हमारा शरीर भौतिक (सभ्यता) है और हमारी आत्मा (संस्कृति) सूक्ष्म। जो दिखाई नहीं देती परन्तु शरीर का संचार करती है | इस तथ्य को हम दूसरी तरह भी समझ सकते है जैसे एक फूल की कलियाँ ,पंखुड़ियां और उसकी बनावट को हम सभ्यता कह सकते है जो फूल का बाहरी स्वरुप है और उस फूल की खुशबू को हम संस्कृति कह सकते है जो फूल का आंतरिक गुण है जो उस फूल की विशेष पहचान है तथा जिससे उस फूल को अन्य फूलों से भिन्न किया जा सकता है | अतः स्पष्ट है कि संस्कृति एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से, एक समाज को दूसरे समाज से और एक वर्ग को दूसरे वर्ग से अलग करती है। 

भारतीय संस्कृति बाकि सभी संस्कृतियों से सबसे प्राचीन और शसक्त मानी जाती है क्योंकि इसका धर्म ,दर्शन और विज्ञान इसको बाकी संस्कृतियों से अलग करता है  तथा आज भी भारतीय जन कितने भी आधुनिक हो गए हों , गुफाओं से लेकर महलों और ऊँची ऊँची अंटालिकाओं का विस्तार कर लिया हो, नए नए उपकरण बना लिए हो इसके बाबजूद भी उनके पहनावे ,खान पान ,आदर सत्कार ,विनम्रता ,पूजा पाठ और रीती रिवाजों में प्राचीन  भारतीय संस्कृति आज भी दिखाई देती है | अतः इस बात से यह बात स्पष्ट  है कि संस्कृति का विकास सभ्यता कि अपेक्षा धीमी गति से  होता है यद्यपि संस्कृति किसी देश या काल कि उपज नहीं  होती  है वरन  यह एक शास्वत प्रक्रिया है जो किसी क्षेत्र विशेष में किसी काल में अपने विशेष स्वरुप के साथ प्रकट होती है | जैसे हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की संस्कृति , यूनानी संस्कृति, पाश्चात्य संस्कृति ,मधयकालीन संस्कृति, मुग़लकालीन संस्कृति इत्यादि |  

अतः अंत में यह कहना अनुचित न होगा कि मनुष्य केवल भौंतिक परिस्तिथियों में सुधार करके ही संतुष्ट नहीं हो पाता है, वह भोजन से ही नहीं जीता शरीर के साथ साथ मन और आत्मा भी हैं जिनको पूर्णता की  आवश्यकता है|  भौतिक उन्नति से  शरीर की भूख तो मिट जाती है किन्तु इसके बाबजूद मन और आत्मा तो अतृप्त ही बने रहते हैं इन्हे संतुष्ट करने के लिए मनुष्य अपना जो  विकास और उन्नति  करता है उसमे उसकी संस्कृति अहम् भूमिका निभाती है | जैसे किसी भी कला के सौंदर्य को अपने विचारों और प्रेम के माध्यम से अभिव्यक्त करना। 

अतः आज इस आधुनिक युग में कई समाज एक दूसरे की संस्कृति को अपना रहे हैं जिससे एक देश, एक समूह की मौलिक संस्कृति का ह्यस् होता जा रहा है जिससे उसकी पहचान है। इसलिए मनुष्य चाहे वो धनी हो या निर्धन उसे इस भौंतिक सभ्य समाज में रहने के लिए अपने आपको सुसंस्कृत करना और अपनी अनावश्यक इक्षाओं को नियंत्रित करना अति आवयक है तभी अपनी विघटित  होती जा रही संस्कृति और सभ्यता को बचाया जा सकता है |   

लेखिका- दीप्ति सोनी

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