हम कृष्ण को भोग क्यों लगाते हैं

हमारे भारत देश में हिंदू परंपरा के अनुसार पूजा पाठ के उपरांत भगवान को भेंट स्वरूप भोग लगाने की परंपरा रही है तथा यह परंपरा प्रदर्शित करती है भगवान के प्रति भक्त के निश्चल प्रेम,भाव व आस्था को जिसे उस भक्त ने इस संसार में रहकर सीखा है, अपनाया है और अनुसरण उपरांत हर दिन अपने भोजन का कुछ भाग अपने आराध्य के प्रति भक्तिभाव  pvjkसे समर्पित कर स्वयं को अनुग्रहित महसूस करता है।.अब प्रश्न उठता है कि भगवान कृष्ण को भोग क्यों लगाया जाता है? उन्होंने ही इस संसार में सब कुछ बनाया है। वही हर चीज के रचयिता हैं। उन्हीं से सब कुछ उत्पijnyन्न और उन्हीं में सब कुछ समाहित है। तब उनको भोग लगाने का क्या प्रयोजन रह जाता है? यह प्रश्न जितना ही गूढ़ है परंतु इसका उत्तर उतना ही मधुर, सुंदर, भावपूर्ण व धर्म के अनुसार है। यदि हम धर्म के दृष्टिकोण से  देखेंगे तो पाएंगे कि यह संसार एक कुटुंब की भांति है जिस प्रकार हम अपने परिवार व कुटुंब में रहकर अपने बड़ों, छोटों को व अपने प्रियजनों को उनको सम्मान देने के लिए उनकी पसंद के अनुसार पकवान बनाकर उनको समर्पित करते हैं तथा यह व्यवहार बड़ों के प्रति व अपने परिजनों के प्रति व्यक्ति के आदर सत्कार व उसकी उदारता को प्रकट करता है जिससे व्यक्ति को आत्म संतोष की अनुभूति होती है। उसी तरह यह संसार जिसका रचयिता परमपिता परमात्मा परमेश्वर भगवान कृष्ण हैं। जिनकी हम संतान हैं उस परमेश्वर से उपजी एक तुच्छ आत्मा है जिसकी कृपा से इस संसार में हमने यह मानव रूप धारण किया है जो अपनी पेट की भूख मिटाने से पहले अपनी आत्मा की भूख मिटाने के लिए अपने आराध्य की पूजा-अर्चना करता है और उसके उपरांत अपने हाथों से भगवान की रूचि का भोजन बनाकर व खरीद कर उनको भक्तिभाव से समर्पित करता है अर्थात उन्हें भोग लगाता है। तत्पश्चात स्वयं ग्रहण करता है व दूसरों में बांटकर प्रसन्नता का अनुभव करता है तथा भगवान का शुक्रिया अदा करता है।
 अतः इस प्रकार भक्त द्वारा भगवान के समक्ष प्रस्तुत किए गए खाद्य पदार्थ के साथ भक्त का भावयुक्त समर्पण ही सही मायने में भोग है जिससे वह पूर्ण रुप से अपने आराध्य कृष्ण का दिल जीत लेता है और अपने प्रभु के आशीर्वाद की छत्रछाया में स्वयं को अनुग्रहित महसूस करता है तभी तो कहा जाता है कि भगवान कृष्ण खाने के नहीं भाव व समर्पण के भूखे हैं। यदि ऐसा ना होता तो भगवान कृष्ण, दुर्योधन की मेवा ना त्यागते, व अपने प्रिय मित्र सुदामा के तीन मुट्ठी भर चावल खाकर उन्हें तीनों लोकों का स्वामी ना बनाते।
अतः भगवान के प्रति भक्त का यह भाव जिसे हम भोग व प्रसाद के रूप में देखते हैं,वह समर्पण का भाव है जो भक्त को भगवान के और करीब ले जाता है और उसके इस मानवीय जीवन को वास्तविक रूप में पूर्णता प्रदान करता है।

वहीं दूसरी ओर कृष्ण को भोग लगाने का धार्मिक व वैज्ञानिक कारण भी है।

धार्मिक दृष्टिकोण के अनुसार भगवान कृष्ण ने गीता के तीसरे अध्याय के १२,१३ और १४ वें श्लोक में कहा है कि संपूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं और अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है तथा वृष्टि यज्ञ से होती है तथा जो व्यक्ति बिना यज्ञ किए भोजन करता है वह चोरी का अन्न खाता है। इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति भगवान को अर्पित किए बिना भोजन ग्रहण करता है वह अन्न देने वाले भगवान से अन्न की चोरी करता है। ऐसे व्यक्ति को उसी प्रकार दंड मिलता है जैसे किसी वस्तु को चुराने की सजा मिलती है तथा जो पापी लोग अपने शरीर पोषण के लिए ही पकाते हैं वे तो पाप को ही खाते हैं।
वहीं दूसरी ओर यदि भोग लगाने की प्रक्रिया को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो पाएंगे कि शरीर को स्वस्थ रखने के लिए एक स्वस्थ भोजन की आवश्यकता पड़ती है जो मन और शरीर को बलशाली और ऊर्जावान बनाता है। यदि हम अशांत मन से भोजन को ग्रहण करते हैं तो इससे स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसीलिए मन की शांति के लिए भोजन से पहले अन्न का कुछ भाग भगवान कृष्ण को अर्पित करके स्वयं ग्रहण करना चाहिए।

वेद ,पुराणों में भी कहा गया है कि ईश्वर का ध्यान करके अर्थात उनको भोग लगाकर के ग्रहण किया गया भोजन अन्न के कुप्रभाव को दूर करता है अर्थात उसके धानदोष को दूर करता है।

यदि हम भगवान कृष्ण को भोग लगाने के महत्व की बात करें तो पाएंगे कि भोग लगाने से व्यक्ति के अंदर के अहंकार का त्याग होता है और उसके अंदर भोजन को स्वयं पहले अर्जित करने के बदले त्याग और दान की भावना भी पैदा होती है जो उसे सही अर्थ में मानव बनाती है।

हमारे भारत देश में अनेक देवी देवताओं की पूजा आराधना बड़े भक्ति भाव से की जाती है तथा हर देवी देवता के अपने प्रिय भोग हैं और उसी के अनुसार उन्हें भोग अर्पित भी करना भी चाहिए परंतु भगवान कृष्ण के भोग में एक ऐसी अनोखी बात है जो उन्हें सारे देवी देवताओं से भिन्न बनाती है वह है उनकी भक्तों के प्रति उदारता जिसको हम छप्पन भोग के रूप में देख सकते हैं। भगवान कृष्ण की रूचि किसी विशिष्ट व्यंजन या पदार्थ तक ही सीमित नहीं है। वैसे तो उन्हें ५६ प्रकार की भोग लगाने की परंपरा रही हैं। परंतु व्यंजन के चुनाव का दायित्व उन्होंने अपने भक्तों पर छोड़ रखा है। जो नमकीन व मीठा कुछ भी हो सकता है परंतु यह ५६ प्रकार के व्यंजन जब भक्त अपने आराध्य भगवान कृष्ण की सबसे प्रिय वस्तु ,तुलसी दल डालकर के उनके सामने प्रस्तुत करते हैं तो वह कृष्ण की सच में उदारता का पात्र बनते हैं।

अतः जब भी भगवान कृष्ण को भोग लगाया जाए तब उनसे यह ही प्रार्थना करनी चाहिए कि हे ईश्वर मेरे पास जो भी है वह आपका ही दिया हुआ है। आपका दिया हुआ अब आपको ही समर्पित करता हूं या करती हूं कृपया करके इसे ग्रहण करें और मुझ पर प्रसन्न हों।

लेखिका - दीप्ति सोनी

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