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फादर्स डे बनाम वंचित परिजन

आज जहाँ देश में हर जगह फादर्स डे मनाया जा रहा है, छोटे बच्चे हो या बड़े आज के दिन अपने पिता से बात करके बधाई दे रहे हैं, उन्हें कोई उपहार दे रहे हैं,या फिर उनके साथ बचपन से लेकर अपनी वर्तमान आयु तक की खिचवाई फोटो को फेसबुक, व्हाट्सएप, और इंस्टाग्राम पर साझा करके अपनी खुशी जाहिर कर रहे हैं| वहीं दूसरी ओर 12 जून को अहमदाबाद में हुई वीभत्स बिमान दुर्घटना ने पूरे संसार को गमगीन कर दिया है| उन पिताओं, माताओं को अपने बच्चों से अलग कर दिया जिन बच्चों ने और माता पिता ने एक दूसरे के साथ मिलकर कभी फादर्स डे, मदरस डे सेलिब्रेट किया होगा| आज वही बच्चे अपने पिता की, या माता पिता दोनों की एक झलक पाने से भी वचिंत हो गये, वहीं दूसरी ओर कई माता- पिता अपने बच्चों की एक झलक पाने से वंचित हो गये| ये क्षण बहुत ही वेदनापूर्ण और भावुक कर देने वाला क्षण है जिससे उबर पाना और इस वीभत्स सत्य को आत्मसात करना परिजनों के लिये इतना आसान नहीं है| रिश्तों में कभी ये फरक नहीं पड़ता कि कोई पास है या दूर, कोई किसी ऊँचे पद पर है या छोटे पद पर, कोई अमीर है या गरीब, फरक पड़ता है तो सिर्फ उसके जीवंत होने का, उसके कुशल होने क...

मेहनत की खुशी

खुशी होती है, जब मेहनत रंग लाती है,  अपने दिल को सुकून देती और दूसरों के मुख पर खुशी ले आती है| ये ही कला है कलाकार की,  कलाकारी का, जो अपने हुनर को मजबूती देती और रिश्तों को प्यार की डोर में बांध जाती है|☺

माता रानी पर कविता

माता के नौ रूप निराले, देते सबको शक्ति अपार। हर व्याधि हर पीड़ा हर लेती, जो शीश झुकाए मैया के द्वार। हम अज्ञानी तू ज्ञानी मां, सब कुछ है तू जाने वाली। कुछ छुपा नहीं तेरे से मां, है सर्वजगत की तू पालन हारी। विद्या की तुम हो देवी, धन की लक्ष्मी तुम कहलाती। अन्नपूर्णा बनकर तुम माता, अपने भक्तों की तुम भूख मिटाती। जोत तुम्हारी अजब निराली मां, जो सुगंध से वातावरण भर देती है। भक्तों के दुख हर लेती है मां, तू खाली झोली भी भर देती है। तेरी महिमा अपरंपार है मां, सदैव करते रहे गुणगान हम। तेरे आशीर्वाद की छत्रछाया में, मिट जाए सब भक्तों के गम। लेखिका - दीप्ति सोनी

हमारा भारतवर्ष (कविता)

हम भारत के वासी हैं,  ये पावन भूमि हमारी है।  इसकी माँटी की खुशबू की,  कुछ बात ही निराली है।  उत्तर में खडा हिमालय,  भारत का पहरेदार है।  जड़ी-बूटियों,औषधियों का दाता,  यह भारत का श्रृंगार है।  इसकी छटा है निराली,  जो प्राणों से भी प्यारी है।  इससे निकलती नदियों की,  कुछ बात ही निराली है।  मंदिर, मज्जित, गिरिजाघरों से सुशोभित्,  भारत ने बनायी अलग पहचान है।  ये कर्म भूमि है, ये धर्म भूमि है,  भारतियों का ये अभिमान है।  है कण-कण भारत का पूजनीय,  जिसने धर्म का मार्ग सिखलाया है।  भिन्न भिन्न जीवनशैली में बंटकर भी,  हमको एकता का पाठ पढ़ाया है।  ऐसे अतुल्य भारत की छवि में,  आओ कहीं खो जाएँ हम।  महसूस करें इसकी माँटी की खुशबू,  इस देश का मान बढ़ाये हम।  आओ तिरंगा फहराये हम || भारत माता की जय जय हिन्द जय भारत🇮🇳   प्रेषक- दीप्ति सोनी

आधुनिकता बनाम प्रकृति (कविता)

आधुनिकता की इस शैली ने,  प्रकृति को ऐसा विक्षिप्त किया।  कहीं धुँए के खूब गुबार उड़ाये,  कहीं प्लास्टिक का अंबार किया।  न ही धरती, न ही अंबर,  अब न ही पानी शुद्ध रहा।  बहती प्राणवायु के बहाव में,  अब शुद्ध वायु का भी अभाव रहा।  जंगल काटे, घरौंदे बाटें,  भूमि को भी बेजान किया।  पीठ थपथपाकर कहता हर पल,  हमने विज्ञान में बहुत नाम किया।  दौड़ रही है दुनिया सारी,  मसीहा बन जाने की चाहत में।  पर बार बार बेबस पड़ जाती,  प्राकृतिक आपदा की ताकत से।  मसीहा वो है ,जिसने ये श्रष्टि बनायी, एक माटी को जीवन दान दिया।  भावनाओं का सैलाब उडेला उसमें,  इस श्रष्टि का सुगम संचार किया।  सुगम संचार को रौंधा हमने,  इंसानियत भी अब ताक पर रख डाली। फिर क्यों कहते हो दुनिया वालों,  ऐसी घड़ी क्यों आन पड़ी।  ऐसी घड़ी क्यों.......... पड़ी।  प्रेषक- दीप्ति सोनी

राजू श्रीवास्तव को भावभीनी श्रद्धांजलि

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कह कर दुनिया को अलविदा,  गजोधर भैया यूँ जल्दी चले गये।  कहलाते थे वो कोमेडी के बादशाह,  आज सबको उदास यूँ छोड़ गये।  याद आती है आज उनकी, वो हास्य प्रस्तुतियाँ,  जो सच में सबको आनंदित करने वाली थीं।  हर वाक्य में झलकती, वो कानपुर की शैली,  जो सबको पल भर में गुदगुदाने वाली थी।  वो शख्स दिखते, बहुत साधारण से थे,  पर उनकी शख्सियत बहुत निराली थी।  मंच पर पहुँचते ही चेहरे पर सबके,  एक हँसी की लहर ले आने वाली थी।  आज मंच है पर नहीं हो आप राजू भैया,  जो फिर से हम सबको बहुत हँसाओगे।  जब जब जिक्र होगा कामेडी का दिल से,  आप सच में सबको बहुत याद आओगे।  आप सच में सबको बहुत याद आओगे।  प्रेषक - दीप्ति सोनी

अनुभव का अर्थ और उसकी महत्वता

जीवन में अक्सर हम अनुभवों से जुड़ी बातें कहते या सुनते हैं या फिर कभी कभी अपने अनुभव दूसरों से समय समय पर साझा करते हैं। तो क्या है इस अनुभव का अर्थ और उसकी महत्वता। इस बात पर थोड़ा प्रकाश डालने की आवश्यकता है।  मेरे अनुसार " किसी कार्य व व्यवहार को निरंतर प्रयोग करते रहने व उस कार्य और व्यवहार की परीक्षा के परिणाम स्वरूप प्राप्त ज्ञान को अनुभव  कहते हैं। " अनुभव किसी भी इंसान के जीवन की अमूल्य निधि होते हैं। जिनके बल पर एक इंसान अपनी जिंदगी में आगे बढ़ता चला जाता है और समाज में अपनी एक नई छवि बनाने में सक्षम हो पाता है। अतः यह कहना गलत न होगा कि अनुभव ही एक व्यक्ति के व्यक्तित्व को किसी दूसरे व्यक्ति के व्यक्तित्व से अलग करते हैं। जीवन में चाहे धन, मित्र, रिश्तेदार, और समाज व्यक्ति के काम आये न आये परन्तु अच्छा और बुरा अनुभव ही इंसान की जिंदगी में हमेशा काम में आता है। अनुभव इंसान का वो रथ है जिसका सारथी स्वंय मनुष्य है और जिसके साथ एक मनुष्य बहुत कुछ हाँसिल कर सकता है और जीवन में अच्छे ,बुरे का भेद भी समझ पाता  है। अनुभव ही प्रगति व समाज को जोड़ने का कार्य करत...

पापा पर कविता

मेरे पापा मेरी पहचान,  मेरे लिए हैं वो भगवान।  जिस दिन पापा नाराज हो जाते,  फीकी पड़ जाती मेरी मुस्कान।  नन्ही सी मुझे गोद में खिलाया,  अंगुलियाँ पकड़कर मुझे चलना सिखाया।  पापा की हूँ मैं प्यारी बेटी,  हर दिन मुझको कुछ अच्छा सिखाया।  सुबह स्कूल उनका, मुझे छोड़ने जाना,  स्कूल से मेरा फिर घर वापस आना।  फोन करके पूछते ऑफिस से,  बिटिया तुम आ गयी जरा बताना।  हर चीज़ का वो मेरा ध्यान रखते,  मेरे लिए हर दिन सोचते रहते।  शिक्षित होकर काबिल बन जाऊँ,  इसलिए दिन रात वो मेहनत करते।  शनिवार, इतवार होते मेरे लिए खास,  जब मैं जाती घूमने पापा के साथ।  नयी नयी फरमाइश करती पापा से,  नखडे दिखाती मैं उनको हजार।  भगवान से मेरी अब यही प्रार्थना,  मेरे पापा को देना खुशियाँ हज़ार।  स्वस्थ, सुखी रखना हरदिन उनको,  कभी न करना उनको उदास।  (दीप्ति सोनी)  दूसरी कविता पिता बच्चों की मुस्कान हैं,  पिता बच्चों का अभिमान हैं।  पिता के साये में रहकर ही,  बच्चों की खुशियाँ आबाद हैं।...

सत्य एक अंसुलझी पहेली

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कहते हैं "सत्य से मुठभेड़ किये बगेर आप अपने आप को कभी पा नहीं सकते हैं।" तो क्या है ये सत्य, ये सवाल न जाने कितने बुद्धिजीवियों के मन में उथल पुथल मचाता है और नयी परिभाषाओं को जन्म देता है। ऐसी अनेक परिभाषाओं में से, मैं भी सत्य की परिभाषा को अपनी कलम का रूप देना चाहूँगी।  "सत्य वे है जिसे हम अपनी पहली साँस से अंतिम हिचकी तक जीते है। उससे प्यार करते हैं और अपने खिलाफ कोई सच बोले तो हम उससे नफ़रत भी करते हैं और अपनी पोल खुल जाने के डर से भयभीत भी होते हैं पर दूसरों के गोपनीय रहस्य को जानने के लिए हमेशा बेताब रहते हैं।"  यही वजह है कि आज कल लोग गूगल सर्च करते हैं, यूट्यूब देखते हैं, किताबें पड़ते हैं और सत्य जानने के लिये ज्योतिषियों के चक्कर लगाते हैं। वैसे सत्य एक जटिल शब्द है। सत्य का स्वभाव ऐसा है कि ये कभी कभी इंसान को विचलित कर देता है तो उसे उस समय सत्य को हजम कर पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। लेकिन एक सच ये भी है कि इस सत्य को अंत में स्वीकार भी करना पड़ता है। अगर ऐसा नहीं होता तो हम मृत्यु को स्वीकार ही न कर पाते। कई बार हमारे मन में एक असुरक्षा क...

सावन का श्रृंगार भोले

बारह ज्योतिर्लिंग तुमसे सुशोभित,  इस धरा के तुम पालनहार हो।  है ओंकारेश्वर, है महाकालेश्वर,  सावन का तुम ही श्रृंगार हो।  सावन के प्रथम सोमवार में,  महादेव आपका स्वागत है।  सच्चे मन से जो कोई तुम्हें पूजे,  उसका हो जाता भव से बेड़ा पार है।  ये सावन भी अधूरा सा लागे जब,  बम बम भोले का नाद न सुने।  आक, धतूरा और भाँग चढ़ाकर,  जब तक भोले तुम्हारा गुणगान न करें।  है कैलाशी, है गंगाधर,  सब भक्तों की फरियाद तुम सुनना।  सावन की इन मीठी-मीठी फुआरों में,  जनमानस का कल्याण तुम करना।  प्रेषक- दीप्ति सोनी

हिन्दी दिवस पर कविता

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नदी की धारा के समान चंचल भाषा,  वो प्यारी भाषा हमारी हिन्दी है।  हर प्रान्त की मिठास को समाहित किये,  वो न्यारी भाषा हमारी हिन्दी है।  हर अक्षर है इसका अद्भुत,  जो हर शब्द को खास बनाता है।  स्वरों की चादर में लिपटकर,  हर वाक्य को अर्थपूर्ण बनाता है।  भावनाओं के सागर में बहकर जब,  कोई शब्द जुबान पर आता है।  तब कोई लेखक हो या वक्ता,  अपने मर्म को समझा पाता है।  उस मर्म की गहराइयों को सहजता से,  अभिव्यक्त कराती हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी है।  भारत देश की शान है जो भाषा,  वो भाषा हमारी हिन्दी है।  वो भाषा हमारी हिन्दी है।  प्रेषक - दीप्ति सोनी

विचारों की शक्ति

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  हम हर दिन कभी न कभी अपनी बातों में  सामान्यता यह कहता हुआ पाते हैं कि आज हमारे मन में ये विचार आया या मेरे विचार से यह होना चाहिए इत्यादि इत्यादि। तब प्रश्न यह उठता है की यह विचार होते क्या हैं तथा किसी कार्य को करने में इनकी क्या भूमिका होती है।  हमारे दिमाग में हर क्षण अनेको सकारात्मक और नकारात्मक विचार आते हैं। इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि विचारों के संग्रह का नाम ही विचार होता है और इन विचारों को संग्रह करने वाला विचारक कहलायेगा। विचार एक ऐसी क्षमता और शक्ति है जो भगवान् ने हम मनुष्यों को इतनी प्रभावशाली तरीके से दी है ताकि हम मनुष्य अपने जीवन में  हर रोज आने वाली समस्याओं का तुरंत समाधान कर पाए। चाहे वो समस्याएँ आंतरिक हो या बाहरी। बशर्ते मनुष्य विचारों को क्रियान्वयन करने के लिए जागरूक हो, चिंतनशील हो और चेतना में हो। सोये हुए व्यक्ति के दिमाग में कितने भी विचार आयें और जायें ,उससे कोई समस्या का समाधान नहीं हो सकता। विचार उन बादलों की तरह हैं जो कभी रुकते नहीं और नदी में तैरती हुई उस नाँव की तरह हैं जिसके तैरने से नदी की गहराइ...

द्रौपदी मुर्मू की ऐतिहासिक जीत

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राजनीति के इस कड़े मुकाबले में जब,  कोई महिला सर्वोच्च सम्मान पाती है।  दिल प्रफुल्लता से भर जाता,  मन देता बार बार बधाई है।  रूप, रंग, जात-पात आड़े नहीं आती,  जब होंसलों में लंबी उड़ान होती है।  उस पद की भी गरिमा बढ़ जाती जब,  कोई नारी उस पर आसीन होती है।  आदिवासी जाति की होकर के भी,  जो मान द्रौपदी मुर्मू आपने पाया है।  15 वीं राष्ट्रपति बनकर भारत की,  सच में इस देश का मान बढ़ाया है।  इस ऐतिहासिक जीत पर द्रौपदी मुर्मू जी, देता पूरा देश आपको बहुत बहुत बधाई।  सफल, सुमंगल हो आपका ये सफर,  जिस पद की आपने, आज शोभा बढ़ाई।  प्रेषक- दीप्ति सोनी

कोरोना की शादी (कविता)

कोरोना तेरे लिए पतंजलि वालों ने,  एक लड़की ढूँढ निकाली है।  कोरोनिल है उसका नाम,  जिससे तेरी शादी होने वाली है।  रामदेव हैं पिता उसके,  प्रकृति उसकी माता है।  अब क्या होगा तेरा कोरोना,  तू इस बंधन में बंधने वाला है।  आवारा बनकर घूमा है तू,  इस पूरी दुनिया में अब तक।  अपने राक्षसी स्वभाव के कारण,  तूने क्षति पहुँचाई है हर पल।  पूरी दुनिया ढूँढ रही जिसे,  वो बैठी थी भारत में छिपकर।  अब जाकर कहीं बाहर आयी,  अपने पिता जी के कहने पर।  कुछ सीख ले तू,  भारत के संस्कारों से।  एक बेटी दे रहा योगी बाप,  तुझे अपने हाथों से।  ये शुभ घड़ी देश में,  आज फिर आई है।  कोरोना वाइरस तुझे,  अनेक-अनेक भधाई है।  इस बंधन में बंधके तू,  यहाँ से जल्दी से निकल ले।  बहुत विचरण कर लिया तूने दुनिया का,  अपने घर में जाकर आराम तू करले।  प्रेषक- दीप्ति सोनी

प्रात:कालीन द्रश्य (कविता)

भोर हुई उजाला फैला,  सूरज के आ जाने पर | प्रकाश से चमक उठी धरती,  किरणों के फैल जाने पर | विशाल अंबर में उड़ते पक्षी,  मस्त पवन में यूँ झूम रहे | अपनी चहचाहट की ध्वनि से,  कानों में मिश्री घोल रहे | हर लता, पेड़ और डाली धरा पर,  झूम झूम कर यूँ नाच रही | सुंदर पुष्प खिलाकर वो मानों,  मन ही मन इठला रही | कितना सुंदर दृश्य है प्रातः का,  इसमें बस खो जाएँ हम | महसूस करें इसकी सुंदरता को,  अपने अंतर्मन को भी जगायें हम |                 प्रेषक -दीप्ति सोनी

दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएं (कविता)

जब जब दिवाली आती है,  मन को हर्षित कर जाती है।  लक्ष्मी गणेश के आगमन की तैयारी,  मन में नई ऊर्जा का संचार कर जाती है।  हर कोना कोना प्रकाशमान हो जाता,  नभ में भी पटाखों का अंबार नजर आता।  हर द्वार - द्वार पर सुंदर रंगोली सजतीं,  घर में भी खुशियों का संसार बस जाता।  मेरी दिवाली, आपकी दिवाली,  है ये दिवाली हम सबकी भी।  हँसों, हँसाओं, खुशियाँ बाँटों,  कामना करो सबकी सुख समृद्धि की।  मिठाइयों की मिठास से सराबोर हो,  हर रिश्ता ,भावनाएं और जिव्हा सबकी।  माता लक्ष्मी का आशीर्वाद मिले आप सबको,  यही है आप सभी के लिये शुभकामनायें दिल से मेरी।  प्रेषक- दीप्ति सोनी

तकनीक का विकास स्मार्ट फोन (कविता)

तकनीक के विकास ने,  ये कैसा जादू ला दिया,  क्या तारीफ करूँ इस जादू की,  जिसने सबको इसका कायल बना दिया।  कोई खींचता इससे फोटो,  कोई करता इससे घंटों बातें।  वॉट्सएप करके, गेम खेलकर,  कट जाती दिन और रातें।  यूट्यूब, फेसबुक, ट्वीटर, इंस्टाग्राम,  इन्हीं का आज जमाना है।  इनमें दिन भर व्यस्त रहकर ही लोग बुनते समाजिकता का ताना बाना है।  मनोरंजन का साथी है ये,  ज्ञान का भंडार कहलाता है।  अंगुलियों के स्पर्श होते ही ये ,  हर दृश्य पटल पर लाता है।  इंटरनेट है इसकी आत्मा,  जो संचालित करती इसके गुणों को।  कार्य पल भर में हो जाते सबके,  जो कोई आदेश देता इसको।  शिक्षित- अशिक्षित का हथियार है ये,  जो हर पल काम में आता है।  एक जगह बैठे बैठे ही,  पूरी दुनिया की शैर करवाता है।  भिन्न भिन्न नामों से सजा हुआ,  स्मार्ट फोन नाम है इसका।  जो कोई इसको हाथ में लेता,  वो स्वतः ही आत्मविश्वास से भर उठता।  (दीप्ति)

मन की बात ईश्वर के साथ

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  विविध जिज्ञासाओं की आंधी ने, कब मेरी सोच के आवेग को रोका था । हर क्षण हर पल विचारों की दुनिया में, मैंने अपनी मस्तिष्क  निरंतर झोंका था। मंथन हुआ जज्बातों का मन और दिल से, कभी मेरे अनुभवों, कभी मेरी शिक्षा ने मुझे राह दिखाई। मेरे संस्कारों ने मुझे मर्यादाओं में सीमित रखकर, मेरे मन में एक निर्णायक सोच बनाई। सोच यही कहती है बस, खुद पर पूर्ण विश्वास करो। कभी ना थको, कभी ना डरो, निरंतर तुम प्रयास करो। चौखट पर जलता दीपक भी, आंधी से लड़ने की ताकत रखता है। बुझते बुझते फिर से जल उठता, अपने आप पर पूर्ण भरोसा रखता है। शिथिल हो जाए मन मस्तिष्क तुम्हारा, कभी न बिखरो, कभी न टूटो तुम। उस परमात्मा की शरण में जाकर, फिर से अपने वजूद को टटोलो तुम। पाओगे वह असीम शक्ति, जिसका तुम्हें अंदाजा नहीं। एक बार आजमा के देखो मेरा यह अनुभव, क्या पता कल बन जाए यह अनुभव, आपका भी। लेखिका - दीप्ति सोनी

संस्कृति और सभ्यता में अंतर

मनुष्य के सम्पूर्ण विकास में उसकी संस्कृति और सभ्यता का विशेष  योगदान रहा है इसलिए हम सभी अपने जीवन में अनेकों बार संस्कृति और सभ्यता की बातें करते और सुनते  हैं | तो क्या है ये संस्कृति और सभ्यता ? क्या ये दोनों एक हैं या भिन्न ? इसको थोड़ा समझने की आवश्यकता है |  सभ्यता [civilization ] और संस्कृति [culutre  ] मानवीय समाजिक जीवन की अमूल्य संपत्ति है जिसके कारण मानव को पशु से भिन्न समझा जाता है तथा सभ्यता, संस्कृति का विशेष अंग है | यद्यपि  इन दोनों को एक दूसरे से भिन्न नहीं किया जा सकता परन्तु इन दोनों के स्वरुप में भिन्नता देखी और समझी जा सकती है |  सभ्यता और संस्कृति में अंतर  सभ्यता से मनुष्य के भौतिक क्षेत्र की प्रगति सूचित होती है जबकि संस्कृति से मनुष्य की मानसिक क्षेत्र की प्रगति सूचित होती है |  सभ्यता साधन है जबकि संस्कृति साध्य /साधना है |  संस्कृति में गहराई होती है जबकि सभ्यता में गहराई का अभाव होता है |  संस्कृति का सम्बन्ध व्यक्ति और समाज में निहित संस्कारों से होता है और उसका निवास व्यक्ति के  मस्तिष्क ...

गणतंत्र दिवस पर बसंत का आगमन

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बसंत पंचमी की फुहार में, गणतंत्र दिवस का जश्न है। कहीं मां शारदे का पूजन है, कहीं देशभक्ति के गीतों में डूबा, मेरा प्यारा ये भारत वतन है। आकाश में मदमस्त होकर फहराता तिरंगा, गा रहा अपनी शौर्य की वीरगाथा। हर विद्यार्थी मां शारदे के चरणों में, झुका रहा है सजल भाव से अपना माथा। कितना सुंदर, कितना पावन, कितना अद्भुत यह नजारा है। मां शारदे का अभिनंदन है। गणतंत्र दिवस पर वसंत का आगमन है। हे शारदे मां तू इस पावन पर्व पर, हम सब को यह आशीर्वाद दें। हर विद्या से परिपूर्ण हो हमारा तन मन, हर सांस इस वतन के लिए कुर्बान रहे। लेखिका - दीप्ति सोनी