संदेश

मेहनत की खुशी

खुशी होती है, जब मेहनत रंग लाती है,  अपने दिल को सुकून देती और दूसरों के मुख पर खुशी ले आती है| ये ही कला है कलाकार की,  कलाकारी का, जो अपने हुनर को मजबूती देती और रिश्तों को प्यार की डोर में बांध जाती है|☺

माता रानी पर कविता

माता के नौ रूप निराले, देते सबको शक्ति अपार। हर व्याधि हर पीड़ा हर लेती, जो शीश झुकाए मैया के द्वार। हम अज्ञानी तू ज्ञानी मां, सब कुछ है तू जाने वाली। कुछ छुपा नहीं तेरे से मां, है सर्वजगत की तू पालन हारी। विद्या की तुम हो देवी, धन की लक्ष्मी तुम कहलाती। अन्नपूर्णा बनकर तुम माता, अपने भक्तों की तुम भूख मिटाती। जोत तुम्हारी अजब निराली मां, जो सुगंध से वातावरण भर देती है। भक्तों के दुख हर लेती है मां, तू खाली झोली भी भर देती है। तेरी महिमा अपरंपार है मां, सदैव करते रहे गुणगान हम। तेरे आशीर्वाद की छत्रछाया में, मिट जाए सब भक्तों के गम। लेखिका - दीप्ति सोनी

हमारा भारतवर्ष (कविता)

हम भारत के वासी हैं,  ये पावन भूमि हमारी है।  इसकी माँटी की खुशबू की,  कुछ बात ही निराली है।  उत्तर में खडा हिमालय,  भारत का पहरेदार है।  जड़ी-बूटियों,औषधियों का दाता,  यह भारत का श्रृंगार है।  इसकी छटा है निराली,  जो प्राणों से भी प्यारी है।  इससे निकलती नदियों की,  कुछ बात ही निराली है।  मंदिर, मज्जित, गिरिजाघरों से सुशोभित्,  भारत ने बनायी अलग पहचान है।  ये कर्म भूमि है, ये धर्म भूमि है,  भारतियों का ये अभिमान है।  है कण-कण भारत का पूजनीय,  जिसने धर्म का मार्ग सिखलाया है।  भिन्न भिन्न जीवनशैली में बंटकर भी,  हमको एकता का पाठ पढ़ाया है।  ऐसे अतुल्य भारत की छवि में,  आओ कहीं खो जाएँ हम।  महसूस करें इसकी माँटी की खुशबू,  इस देश का मान बढ़ाये हम।  आओ तिरंगा फहराये हम || भारत माता की जय जय हिन्द जय भारत🇮🇳   प्रेषक- दीप्ति सोनी

आधुनिकता बनाम प्रकृति (कविता)

आधुनिकता की इस शैली ने,  प्रकृति को ऐसा विक्षिप्त किया।  कहीं धुँए के खूब गुबार उड़ाये,  कहीं प्लास्टिक का अंबार किया।  न ही धरती, न ही अंबर,  अब न ही पानी शुद्ध रहा।  बहती प्राणवायु के बहाव में,  अब शुद्ध वायु का भी अभाव रहा।  जंगल काटे, घरौंदे बाटें,  भूमि को भी बेजान किया।  पीठ थपथपाकर कहता हर पल,  हमने विज्ञान में बहुत नाम किया।  दौड़ रही है दुनिया सारी,  मसीहा बन जाने की चाहत में।  पर बार बार बेबस पड़ जाती,  प्राकृतिक आपदा की ताकत से।  मसीहा वो है ,जिसने ये श्रष्टि बनायी, एक माटी को जीवन दान दिया।  भावनाओं का सैलाब उडेला उसमें,  इस श्रष्टि का सुगम संचार किया।  सुगम संचार को रौंधा हमने,  इंसानियत भी अब ताक पर रख डाली। फिर क्यों कहते हो दुनिया वालों,  ऐसी घड़ी क्यों आन पड़ी।  ऐसी घड़ी क्यों.......... पड़ी।  प्रेषक- दीप्ति सोनी

राजू श्रीवास्तव को भावभीनी श्रद्धांजलि

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कह कर दुनिया को अलविदा,  गजोधर भैया यूँ जल्दी चले गये।  कहलाते थे वो कोमेडी के बादशाह,  आज सबको उदास यूँ छोड़ गये।  याद आती है आज उनकी, वो हास्य प्रस्तुतियाँ,  जो सच में सबको आनंदित करने वाली थीं।  हर वाक्य में झलकती, वो कानपुर की शैली,  जो सबको पल भर में गुदगुदाने वाली थी।  वो शख्स दिखते, बहुत साधारण से थे,  पर उनकी शख्सियत बहुत निराली थी।  मंच पर पहुँचते ही चेहरे पर सबके,  एक हँसी की लहर ले आने वाली थी।  आज मंच है पर नहीं हो आप राजू भैया,  जो फिर से हम सबको बहुत हँसाओगे।  जब जब जिक्र होगा कामेडी का दिल से,  आप सच में सबको बहुत याद आओगे।  आप सच में सबको बहुत याद आओगे।  प्रेषक - दीप्ति सोनी

अनुभव का अर्थ और उसकी महत्वता

जीवन में अक्सर हम अनुभवों से जुड़ी बातें कहते या सुनते हैं या फिर कभी कभी अपने अनुभव दूसरों से समय समय पर साझा करते हैं। तो क्या है इस अनुभव का अर्थ और उसकी महत्वता। इस बात पर थोड़ा प्रकाश डालने की आवश्यकता है।  मेरे अनुसार " किसी कार्य व व्यवहार को निरंतर प्रयोग करते रहने व उस कार्य और व्यवहार की परीक्षा के परिणाम स्वरूप प्राप्त ज्ञान को अनुभव  कहते हैं। " अनुभव किसी भी इंसान के जीवन की अमूल्य निधि होते हैं। जिनके बल पर एक इंसान अपनी जिंदगी में आगे बढ़ता चला जाता है और समाज में अपनी एक नई छवि बनाने में सक्षम हो पाता है। अतः यह कहना गलत न होगा कि अनुभव ही एक व्यक्ति के व्यक्तित्व को किसी दूसरे व्यक्ति के व्यक्तित्व से अलग करते हैं। जीवन में चाहे धन, मित्र, रिश्तेदार, और समाज व्यक्ति के काम आये न आये परन्तु अच्छा और बुरा अनुभव ही इंसान की जिंदगी में हमेशा काम में आता है। अनुभव इंसान का वो रथ है जिसका सारथी स्वंय मनुष्य है और जिसके साथ एक मनुष्य बहुत कुछ हाँसिल कर सकता है और जीवन में अच्छे ,बुरे का भेद भी समझ पाता  है। अनुभव ही प्रगति व समाज को जोड़ने का कार्य करत...

पापा पर कविता

मेरे पापा मेरी पहचान,  मेरे लिए हैं वो भगवान।  जिस दिन पापा नाराज हो जाते,  फीकी पड़ जाती मेरी मुस्कान।  नन्ही सी मुझे गोद में खिलाया,  अंगुलियाँ पकड़कर मुझे चलना सिखाया।  पापा की हूँ मैं प्यारी बेटी,  हर दिन मुझको कुछ अच्छा सिखाया।  सुबह स्कूल उनका, मुझे छोड़ने जाना,  स्कूल से मेरा फिर घर वापस आना।  फोन करके पूछते ऑफिस से,  बिटिया तुम आ गयी जरा बताना।  हर चीज़ का वो मेरा ध्यान रखते,  मेरे लिए हर दिन सोचते रहते।  शिक्षित होकर काबिल बन जाऊँ,  इसलिए दिन रात वो मेहनत करते।  शनिवार, इतवार होते मेरे लिए खास,  जब मैं जाती घूमने पापा के साथ।  नयी नयी फरमाइश करती पापा से,  नखडे दिखाती मैं उनको हजार।  भगवान से मेरी अब यही प्रार्थना,  मेरे पापा को देना खुशियाँ हज़ार।  स्वस्थ, सुखी रखना हरदिन उनको,  कभी न करना उनको उदास।  (दीप्ति सोनी)  दूसरी कविता पिता बच्चों की मुस्कान हैं,  पिता बच्चों का अभिमान हैं।  पिता के साये में रहकर ही,  बच्चों की खुशियाँ आबाद हैं।...