संदेश

सत्य एक अंसुलझी पहेली

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कहते हैं "सत्य से मुठभेड़ किये बगेर आप अपने आप को कभी पा नहीं सकते हैं।" तो क्या है ये सत्य, ये सवाल न जाने कितने बुद्धिजीवियों के मन में उथल पुथल मचाता है और नयी परिभाषाओं को जन्म देता है। ऐसी अनेक परिभाषाओं में से, मैं भी सत्य की परिभाषा को अपनी कलम का रूप देना चाहूँगी।  "सत्य वे है जिसे हम अपनी पहली साँस से अंतिम हिचकी तक जीते है। उससे प्यार करते हैं और अपने खिलाफ कोई सच बोले तो हम उससे नफ़रत भी करते हैं और अपनी पोल खुल जाने के डर से भयभीत भी होते हैं पर दूसरों के गोपनीय रहस्य को जानने के लिए हमेशा बेताब रहते हैं।"  यही वजह है कि आज कल लोग गूगल सर्च करते हैं, यूट्यूब देखते हैं, किताबें पड़ते हैं और सत्य जानने के लिये ज्योतिषियों के चक्कर लगाते हैं। वैसे सत्य एक जटिल शब्द है। सत्य का स्वभाव ऐसा है कि ये कभी कभी इंसान को विचलित कर देता है तो उसे उस समय सत्य को हजम कर पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। लेकिन एक सच ये भी है कि इस सत्य को अंत में स्वीकार भी करना पड़ता है। अगर ऐसा नहीं होता तो हम मृत्यु को स्वीकार ही न कर पाते। कई बार हमारे मन में एक असुरक्षा क...

सावन का श्रृंगार भोले

बारह ज्योतिर्लिंग तुमसे सुशोभित,  इस धरा के तुम पालनहार हो।  है ओंकारेश्वर, है महाकालेश्वर,  सावन का तुम ही श्रृंगार हो।  सावन के प्रथम सोमवार में,  महादेव आपका स्वागत है।  सच्चे मन से जो कोई तुम्हें पूजे,  उसका हो जाता भव से बेड़ा पार है।  ये सावन भी अधूरा सा लागे जब,  बम बम भोले का नाद न सुने।  आक, धतूरा और भाँग चढ़ाकर,  जब तक भोले तुम्हारा गुणगान न करें।  है कैलाशी, है गंगाधर,  सब भक्तों की फरियाद तुम सुनना।  सावन की इन मीठी-मीठी फुआरों में,  जनमानस का कल्याण तुम करना।  प्रेषक- दीप्ति सोनी

हिन्दी दिवस पर कविता

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नदी की धारा के समान चंचल भाषा,  वो प्यारी भाषा हमारी हिन्दी है।  हर प्रान्त की मिठास को समाहित किये,  वो न्यारी भाषा हमारी हिन्दी है।  हर अक्षर है इसका अद्भुत,  जो हर शब्द को खास बनाता है।  स्वरों की चादर में लिपटकर,  हर वाक्य को अर्थपूर्ण बनाता है।  भावनाओं के सागर में बहकर जब,  कोई शब्द जुबान पर आता है।  तब कोई लेखक हो या वक्ता,  अपने मर्म को समझा पाता है।  उस मर्म की गहराइयों को सहजता से,  अभिव्यक्त कराती हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी है।  भारत देश की शान है जो भाषा,  वो भाषा हमारी हिन्दी है।  वो भाषा हमारी हिन्दी है।  प्रेषक - दीप्ति सोनी

विचारों की शक्ति

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  हम हर दिन कभी न कभी अपनी बातों में  सामान्यता यह कहता हुआ पाते हैं कि आज हमारे मन में ये विचार आया या मेरे विचार से यह होना चाहिए इत्यादि इत्यादि। तब प्रश्न यह उठता है की यह विचार होते क्या हैं तथा किसी कार्य को करने में इनकी क्या भूमिका होती है।  हमारे दिमाग में हर क्षण अनेको सकारात्मक और नकारात्मक विचार आते हैं। इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि विचारों के संग्रह का नाम ही विचार होता है और इन विचारों को संग्रह करने वाला विचारक कहलायेगा। विचार एक ऐसी क्षमता और शक्ति है जो भगवान् ने हम मनुष्यों को इतनी प्रभावशाली तरीके से दी है ताकि हम मनुष्य अपने जीवन में  हर रोज आने वाली समस्याओं का तुरंत समाधान कर पाए। चाहे वो समस्याएँ आंतरिक हो या बाहरी। बशर्ते मनुष्य विचारों को क्रियान्वयन करने के लिए जागरूक हो, चिंतनशील हो और चेतना में हो। सोये हुए व्यक्ति के दिमाग में कितने भी विचार आयें और जायें ,उससे कोई समस्या का समाधान नहीं हो सकता। विचार उन बादलों की तरह हैं जो कभी रुकते नहीं और नदी में तैरती हुई उस नाँव की तरह हैं जिसके तैरने से नदी की गहराइ...

द्रौपदी मुर्मू की ऐतिहासिक जीत

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राजनीति के इस कड़े मुकाबले में जब,  कोई महिला सर्वोच्च सम्मान पाती है।  दिल प्रफुल्लता से भर जाता,  मन देता बार बार बधाई है।  रूप, रंग, जात-पात आड़े नहीं आती,  जब होंसलों में लंबी उड़ान होती है।  उस पद की भी गरिमा बढ़ जाती जब,  कोई नारी उस पर आसीन होती है।  आदिवासी जाति की होकर के भी,  जो मान द्रौपदी मुर्मू आपने पाया है।  15 वीं राष्ट्रपति बनकर भारत की,  सच में इस देश का मान बढ़ाया है।  इस ऐतिहासिक जीत पर द्रौपदी मुर्मू जी, देता पूरा देश आपको बहुत बहुत बधाई।  सफल, सुमंगल हो आपका ये सफर,  जिस पद की आपने, आज शोभा बढ़ाई।  प्रेषक- दीप्ति सोनी

कोरोना की शादी (कविता)

कोरोना तेरे लिए पतंजलि वालों ने,  एक लड़की ढूँढ निकाली है।  कोरोनिल है उसका नाम,  जिससे तेरी शादी होने वाली है।  रामदेव हैं पिता उसके,  प्रकृति उसकी माता है।  अब क्या होगा तेरा कोरोना,  तू इस बंधन में बंधने वाला है।  आवारा बनकर घूमा है तू,  इस पूरी दुनिया में अब तक।  अपने राक्षसी स्वभाव के कारण,  तूने क्षति पहुँचाई है हर पल।  पूरी दुनिया ढूँढ रही जिसे,  वो बैठी थी भारत में छिपकर।  अब जाकर कहीं बाहर आयी,  अपने पिता जी के कहने पर।  कुछ सीख ले तू,  भारत के संस्कारों से।  एक बेटी दे रहा योगी बाप,  तुझे अपने हाथों से।  ये शुभ घड़ी देश में,  आज फिर आई है।  कोरोना वाइरस तुझे,  अनेक-अनेक भधाई है।  इस बंधन में बंधके तू,  यहाँ से जल्दी से निकल ले।  बहुत विचरण कर लिया तूने दुनिया का,  अपने घर में जाकर आराम तू करले।  प्रेषक- दीप्ति सोनी

प्रात:कालीन द्रश्य (कविता)

भोर हुई उजाला फैला,  सूरज के आ जाने पर | प्रकाश से चमक उठी धरती,  किरणों के फैल जाने पर | विशाल अंबर में उड़ते पक्षी,  मस्त पवन में यूँ झूम रहे | अपनी चहचाहट की ध्वनि से,  कानों में मिश्री घोल रहे | हर लता, पेड़ और डाली धरा पर,  झूम झूम कर यूँ नाच रही | सुंदर पुष्प खिलाकर वो मानों,  मन ही मन इठला रही | कितना सुंदर दृश्य है प्रातः का,  इसमें बस खो जाएँ हम | महसूस करें इसकी सुंदरता को,  अपने अंतर्मन को भी जगायें हम |                 प्रेषक -दीप्ति सोनी