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2021 में 12वीं कक्षा की परीक्षाएं रद्द होने पर विधार्थियों की ख़ुशी पर कविता

न रात को नींद थी,  न दिन में सुकून था।  बस बारहवीं परीक्षा का,  सुबह और शाम डर था।  देखो बदल गये हालत,  यह क्या से क्या हो गया।  मन की मुराद पूरी हुई,  और एग्जाम भी रद्द हो गया।  अब न परसंटेज की टेंसन है,  न सिर पर पढ़ाई का भार है।  न माँ बाप की हर रोज की चिक चिक,  अब बस ,पूरे दिन आराम ही आराम है।  यारों, फेयरवेल नहीं हो पाई,  इस बात का थोड़ा सा तो गम है।  पर ये अच्छे दिन की लहर है,  इससे बड़ा उपहार क्या कम है।  हम उस पीढ़ी के विद्यार्थी हैं,  जिनकी झोली में यह खुशी आयी है।  बिना परीक्षा उत्तीर्ण किये ही,  रिशतेदारों से ले रहे बधाई हैं।  प्रतिभाशाली छात्रों की क्या कहें,  कमजोर छात्र भी इस लहर में तर गये।  जो फँसे थे मैथ्स, साइंस के फॉर्मूले में,  सरकार के इस निर्णय से,आज वो भी अब बच गये।  प्रेषक - दीप्ति सोनी

हनुमान जी का जीवन एक प्रेरणास्त्रोत

परम राम भक्त हनुमान जी को आज कौन नहीं जानता है। इस कलियुग में हनुमान जी ही एक ऐसे प्रभावशाली भगवान् के रूप जाने जाते हैं जिन्हें अमरता का वरदान प्राप्त है। जिन्हें आज हम उनके कई नामों से जानते व भजते हैं जैसे पवनपुत्र हनुमान, अंजनिसुत, बजरंगबलि, महाबली इत्यादि। उनके नाम मात्र को जपने से ही सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। उनका जीवन स्वयम् में इतना प्रभावशाली है जिससे प्रभावित होकर प्रत्येक व्यक्ति न केवल एक सज्जन नागरिक बन सकता है बल्कि अपने जीवन में आने वाली हर कठिनाइयों व परेशानियों को अपनी बुद्धिमता व बल से पार करके अपनी मंजिल तक पहुँचकर अपने जीवन को सफल बना सकता है।  अतः हनुमान जी के जीवन से हमें यह निम्नलिखित प्रेरणा  मिलती है।  1-  जब तक काम पूरा न हो, हमें विश्राम् नहीं करना चाहिए।  2- हर मुश्किल समय में अपना धैर्य बनाये रखना चाहिए ताकि जरूरत पड़ने पर हम अपनी बुद्धि, विवेक का सही तरह से सदुपयोग करके बड़ी से बड़ी समस्याओं का समाधान आसानी से निकाल सके।  3- हमें सदैव ही अपने कार्यों के प्रति समर्पण का भाव रखना चाहिए क्योंकि समर्पण का भाव ही किसी किये ग...

कोरोना काल में शमशान की व्यथा(कविता)

सुबह भी जला, रात भी जला,  भोर साँझ का न अब अता पता। थक चुका हूँ मैं जलते जलते,  आग की होली खेलते खेलते।  अब मेरी रूह भी काँप रही,  दृश्य भयावह दिखा रही।  ऐसा मंजर मैने कभी न देखा।  शवों का मानो लगा है मेला।  अपनों की वो लंबी भीड़ कहाँ,  वो पहले जैसी अब बात कहाँ।  हर रिश्ता मुझमें जलकर खाक हुआ,  मैं निशब्द सा ये दृश्य देख रहा।  हर रिश्ता मुझसे यूँ पूछ रहा,  मानों मैंने कोई जुल्म किया।  न मैं अपराधी, न मैं दोषी,  निस्वार्थ भाव से निभा रहा ड्यूटी।  अब मेरी काया को आराम कहाँ,  दो पल का अब विश्राम कहाँ।  इतना तपा कि सब कुछ भूल गया,  जहाँ खडा था, अब भी वहीं हूँ खडा।  ऐ  वक्त, अब यहीं थम जा,  मुझे हर पल अब यूँ न जला ।  मुझे कुछ पल का विश्राम तो दे,  इस दुनिया को फिर से चैन और आराम तो दे।  प्रेषक- दीप्ति सोनी

राष्ट्रहित ही सर्वोपरि (कविता)

निरपराध  हो रही मौतों का तुम,  किसको जिम्मेदार ठहराओगे। किसको जेल में बंद करोगे,  किसको सूली पर चड़वाओगे।  सत्ता में हो,कोई भी पार्टी,  मुझे उससे कोई सरोकार नहीं।  राष्ट्रहित सबके लिए है जरूरी,  उससे बड़ा कोई परोपकार नहीं।  वसुधैव कुटुंबकम का मूलमंत्र,  सुनने में बहुत अच्छा लगता है।  पीड़ा होती है मन में जब कोई,   इंसान तिल तिल करके मरता है।  गिड़गिड़ा रही असहाय जनता,  इस लाचार पड़ी व्यवस्था में।  छीन लिया गया उनका संसार,  बेरहम धनलोलुप व्यवस्था ने।  धन का क्या है ओ खुदगर्जों,  धन तो फिर से कमा लोगे।  क्योँ करते हो कालाबजारी,  कौन सा महल तुम बना लोगे।  देह नहीं तो महल कैसा,  क्या तुम लेकर जाओगे। ,  जिस माटी में पले बड़े हो,  इस माटी में ही मिल जाओगे।  ये न भूलों ओ इंसानों,  ये देश नहीं, देव भूमि है महापुरुषों की,  जरा, इसकी थोड़ी सी तो लाज रखो।  अपने शर्मनाक कर्मों से, इस भूमि को  यूँ तो शर्मशार न करो।  यूँ तो शर्मशार.................. न क...

साँसों का संघर्ष (कविता)

साँसों का संघर्ष अभी जारी है, मौत जिंदगी पर सदैव भारी है। हर जगह अफरा तफरी है मची, यह समय बड़ा ही विस्मयकारी है। घूम रहे अचंभित लोग यहाँ वहाँ, हो रही साँसों की सौदेबाजी से। कहीं इंसानियत बिक चुकी तो, कहीं इंसानियत पर धर्म की पहरेदारी है। आँसू है, गम है, पीड़ा है अपार, इस नाउम्मीदी भरे माहौल में। दानव और मानव के इस युद्ध में, चमत्कार की भोर अभी बाकी है। प्रेषक- दीप्ति सोनी

यही है जीवन की यात्रा (कविता)

जिस काया को खूब सजाया,  अलग अलग किरदारों में निभाया।  उपलब्धियों का ताज पहनकर,  संसार में रहकर कुछ नाम कमाया।  उस काया का यूँ चले जाना,  कुछ कटु सवाल पूछता है।  आज जिंदगी मौत से हार रही,  क्या इतना ही रैन बसेरा है।  संघर्ष करके जो सफलता पाई,  सपनों की ऊँची उड़ान लगाई।  हर रिश्ते की मर्यादा रखकर,  संबंधों की लम्बी डोर सजाई।  सपने टूटे, रिश्ते भी छूटे,  धन भी अंत में काम न आपाया।  जिंदगी से मौत की इस पगडंडी पर,  अपना सत्कर्म ही कुछ फल दे पाया।  शवों की लम्बी कतार लगी,  हर शव एक दूसरे से पूछ रहा।  तू भी शांत, मैं भी शांत,  तुझमें, मुझमें फिर क्या भेद रहा।  इस काया ने जो सींची यात्रा,  कुछ पल में ही बस राख हुई।  कुछ तेज लपटों में जली, तो कुछ माटी में,सुपुर्दे खाक हुई।  हर पल ये सवाल मन में,  बार बार दस्तक करता है।  क्यों अहम का चोला ओढ़ के इंसान,  मेरा मेरा करता है, मेरा मेरा करता है।  लेखिका - दीप्ति सोनी

कोरोना का कहर (कविता)

मास्क बिके, सेनेटाइज़र भी बिके,  बिक रही आक्सीजन भी अब मोल।  कोरोना की इस भीषण सुनामी में,  साँसें भी पड़ रही अब कमजोर।  जगह जगह हाहाकार मचा रहा,  मच रहा रुदन और कहीं शोर।  सिस्टम भी लाचार बन पड़ा,  जनता देखे अब किस ओर।  ये इम्तहान की घड़ी है,  या घड़ी है इस कालचक्र की।  जो बच गया, समझो वही सिकंदर,  वरना छूटती जा रही, अब हर आस भी।  ये कभी सोचा किसी ने,  ऐसा कैसे और क्यों हुआ।  हवा भी दवा बन गयी,  इंसान घर में क्यों कैद हुआ।  कुछ गलत कर्म किये होंगे हमने शायद,  जो आज सजा ऐसी पायी है।  खुशनुमा इस धरती के आँगन में,  इस मंजर ने ली अंगड़ाई है।  जान है तो जहान है,  ये तो सब बतियाते है।  जिंदगी के लिए क्या है अनमोल,  पर ये क्यों भूल जाते हैं।  अब भी समय है,  सोचो, समझो चेतना में आओ।  प्रकृति कितनी अनमोल है,  इस बात को अपने मन में ठहराओ।  हम प्रकृति के दास है,  प्रकृति हमारी दासी नहीं।  करी थी जो हमने मनमानी,  तभी दिखती नहीं खुशहाली कहीं।...