राष्ट्रहित ही सर्वोपरि (कविता)


निरपराध  हो रही मौतों का तुम, 
किसको जिम्मेदार ठहराओगे।
किसको जेल में बंद करोगे, 
किसको सूली पर चड़वाओगे। 

सत्ता में हो,कोई भी पार्टी, 
मुझे उससे कोई सरोकार नहीं। 
राष्ट्रहित सबके लिए है जरूरी, 
उससे बड़ा कोई परोपकार नहीं। 

वसुधैव कुटुंबकम का मूलमंत्र, 
सुनने में बहुत अच्छा लगता है। 
पीड़ा होती है मन में जब कोई,  
इंसान तिल तिल करके मरता है। 

गिड़गिड़ा रही असहाय जनता, 
इस लाचार पड़ी व्यवस्था में। 
छीन लिया गया उनका संसार, 
बेरहम धनलोलुप व्यवस्था ने। 

धन का क्या है ओ खुदगर्जों, 
धन तो फिर से कमा लोगे। 
क्योँ करते हो कालाबजारी, 
कौन सा महल तुम बना लोगे। 

देह नहीं तो महल कैसा, 
क्या तुम लेकर जाओगे। , 
जिस माटी में पले बड़े हो, 
इस माटी में ही मिल जाओगे। 

ये न भूलों ओ इंसानों, 
ये देश नहीं, देव भूमि है महापुरुषों की, 
जरा, इसकी थोड़ी सी तो लाज रखो। 
अपने शर्मनाक कर्मों से, इस भूमि को 
यूँ तो शर्मशार न करो। 
यूँ तो शर्मशार.................. न करो। 

प्रेषक- दीप्ति सोनी

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