यही है जीवन की यात्रा (कविता)



जिस काया को खूब सजाया, 
अलग अलग किरदारों में निभाया। 
उपलब्धियों का ताज पहनकर, 
संसार में रहकर कुछ नाम कमाया। 

उस काया का यूँ चले जाना, 
कुछ कटु सवाल पूछता है। 
आज जिंदगी मौत से हार रही, 
क्या इतना ही रैन बसेरा है। 

संघर्ष करके जो सफलता पाई, 
सपनों की ऊँची उड़ान लगाई। 
हर रिश्ते की मर्यादा रखकर, 
संबंधों की लम्बी डोर सजाई। 

सपने टूटे, रिश्ते भी छूटे, 
धन भी अंत में काम न आपाया। 
जिंदगी से मौत की इस पगडंडी पर, 
अपना सत्कर्म ही कुछ फल दे पाया। 

शवों की लम्बी कतार लगी, 
हर शव एक दूसरे से पूछ रहा। 
तू भी शांत, मैं भी शांत, 
तुझमें, मुझमें फिर क्या भेद रहा। 

इस काया ने जो सींची यात्रा, 
कुछ पल में ही बस राख हुई। 
कुछ तेज लपटों में जली,
तो कुछ माटी में,सुपुर्दे खाक हुई। 

हर पल ये सवाल मन में, 
बार बार दस्तक करता है। 
क्यों अहम का चोला ओढ़ के इंसान, 
मेरा मेरा करता है, मेरा मेरा करता है। 

लेखिका - दीप्ति सोनी

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