योग का अर्थ और उसका महत्व
योग का अर्थ " योग एक ऐसी गूढ़ साधना और प्रक्रिया है जो शारीरिक,मानसिक और आध्यात्मिक रूप से पूरे शरीर को एकाग्रचित् होकर जोड़ने का प्रयास करती है। अर्थात योग का अर्थ है जोड़ना या जुड़ना।"
अब प्रश्न यह उठता है कि योग की उत्पति किसने की और इसके संस्थापक कौन हैं।
योग के संस्थापक आदियोगी शिव को माना गया है। जो न केवल एक आलौकिक साधना में लीन रहते है। बल्कि उनकी नृत्य की शैली में भी एक विशिष्ट योग मुद्रा की झलक देखने को मिलती है। आज से लाखों वर्ष पूर्व मनुष्य अपनी इन्द्रियों को नियंत्रित करके और योग साधना में लीन होकर अपने शरीर की आत्मा को परमात्मा से इस तरह से जोड़ लेते थे कि उस पर किसी बाहरी पदार्थ का असर नहीं होता था। तब यह ही योग हजारों वर्षों की तपस्या कहलाता था। परंतु आज वर्तमान समय में योग की विचारधारा में बदलाव आया है और इस विचारधारा में बदलाव लाया आज से २०० ईसा पूर्व योग सूत्र के रचयिता महर्षि पतंजलि ने जिन्होंने योग को नई दिशा दी। पतंजलि ने योग के १९५ सूत्रों को प्रतिपादित किया है पतंजलि ही पहले और एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने योग को आस्था, अंधविश्वास और धर्म से बाहर निकालकर एक सुव्यवस्थित रूप दिया।
योग के आठ अंग बताये गये हैं।
1- यम (शपथ)
2- नियम ( आचरण- अनुशासन)
3- आसन ( मुद्राएँ)
4- प्राणायाम (स्वाँस नियंत्रण)
5- प्रत्याहार ( इन्द्रियों का नियंत्रण)
6- धारण (एकाग्रता)
7- ध्यान (मेडिटेशन)
8- समाधि (परमानंद या अंतिम मुक्ति)
वर्तमान में योग के तीन ही अंग प्रचलन में है।
1- आसन
2- प्राणायाम
3- ध्यान
आज के व्यस्त समय में कुछ मनुष्य अपने शरीर को स्वस्थ, तनावमुक्त और निरोगी बनाने के लिये प्रतिदिन कुछ समय निकालकर भिन्न भिन्न आसनों को करते हैं। जिससे न केवल वे शारीरिक और मानसिक रूप से अपने आपको स्वस्थ व पुष्ट महसूस करते हैं। बल्कि एक नई ऊर्जा को अपने अंदर समाहित करते हैं। यह समाहित शब्द ही योग के वास्तविक अर्थ को फलीभूत करता है। एक विधार्थी के जीवन से लेकर एक वृद्धवस्था के जीवन में योग में उपरोक्त आठ अंगों का विशेष महत्व है।
गीता में श्री कृष्ण ने एक स्थान पर कहा है
"योग: कर्मसुकौसलम " (कर्मों की कुशलता ही योग है। )
किसी भी व्यक्ति की सफलता चाहे वह शरीरिक हो या मानसिक उसके कर्म योगी होने का एक सच्चा प्रमाण है।कोई भी विधार्थी बिना अनुशासन, ध्यान और एकाग्रता के अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता। वहीं कोई भी व्यक्ति बिना योग के अपने शरीर को निरोगी व सक्षम नहीं बना सकता है। स्वामी बाबा रामदेव इसका जीता जागता उदाहरण है। उन्होंने न केवल अपनी पैरालाइसिस जैसी बीमारी पर योग के माध्यम से विजय पाई बल्कि योग की ऐसी पाठशाला खोली जिसने आमजनमानस को ऐसी राह दिखाई जिस पर चलकर शरीरिक व मानसिक रूप से परेशान व्यक्तियों ने न केवल योग के माध्यम से अपने शरीर को स्वस्थ और सुडौल कर लिया बल्कि वर्षों से चली आ रही अपनी बीमारियों से हमेशा के लिए निजात पाई।
योग का महत्व-
योग से शरीर के सभी अंग पुष्ट, स्वस्थ और सुदृढ़ बनते हैं। योग से जीवन को तनाव मुक्त किया जा सकता है तथा अपनी शरीरिक व मानसिक क्रियाओं पर नियंत्रण रखकर अपनी जीवन शैली में संतुलन लाया जा सकता है।
अतः प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में योग का विशेष महत्व है इसलिए योग की बढ़ती महत्वता और जीवन में योग की उपयोगिता व प्रसिद्धि के बाद पहली बार 11 दिसंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रत्येक वर्ष 21 जून को विश्व योग दिवस के रूप में मान्यता दी है।
अतः ये योग की शक्ति ही है जिसने पूरे विश्व को न केवल एक धागे में पिरोया है बल्कि एक स्वस्थ और निरोगी समाज की स्थापना पर बल दिया है।
योग दिवस पर कविता
प्रकृति का संचार है योग,
मन को वश में करता योग।
योग की साधना पर चल कर,
शरीर हो जाता बिल्कुल निरोग।
गरीब,अमीर में भेद न करता,
करता प्रेरित इसका उपयोग,।
है कठिन मगर असंभव नहीं,
अपनाते इसे हर आयु के लोग।
योग है एक सुंदर साधना,
स्वाँस और मन के एकाग्रिता की।
प्रकाशित करती तन की काया,
एक तरंग उठती जब चेतना की।
आओ इस योग दिवस पर,
कुछ योग आसन अपनायें।
सुप्तावास्ता मैं पड़ी काया को,
फिर से ऊर्जावान बनायें।
प्रेषक - दीप्ति सोनी
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