संदेश

कोरोना काल में शमशान की व्यथा(कविता)

सुबह भी जला, रात भी जला,  भोर साँझ का न अब अता पता। थक चुका हूँ मैं जलते जलते,  आग की होली खेलते खेलते।  अब मेरी रूह भी काँप रही,  दृश्य भयावह दिखा रही।  ऐसा मंजर मैने कभी न देखा।  शवों का मानो लगा है मेला।  अपनों की वो लंबी भीड़ कहाँ,  वो पहले जैसी अब बात कहाँ।  हर रिश्ता मुझमें जलकर खाक हुआ,  मैं निशब्द सा ये दृश्य देख रहा।  हर रिश्ता मुझसे यूँ पूछ रहा,  मानों मैंने कोई जुल्म किया।  न मैं अपराधी, न मैं दोषी,  निस्वार्थ भाव से निभा रहा ड्यूटी।  अब मेरी काया को आराम कहाँ,  दो पल का अब विश्राम कहाँ।  इतना तपा कि सब कुछ भूल गया,  जहाँ खडा था, अब भी वहीं हूँ खडा।  ऐ  वक्त, अब यहीं थम जा,  मुझे हर पल अब यूँ न जला ।  मुझे कुछ पल का विश्राम तो दे,  इस दुनिया को फिर से चैन और आराम तो दे।  प्रेषक- दीप्ति सोनी

राष्ट्रहित ही सर्वोपरि (कविता)

निरपराध  हो रही मौतों का तुम,  किसको जिम्मेदार ठहराओगे। किसको जेल में बंद करोगे,  किसको सूली पर चड़वाओगे।  सत्ता में हो,कोई भी पार्टी,  मुझे उससे कोई सरोकार नहीं।  राष्ट्रहित सबके लिए है जरूरी,  उससे बड़ा कोई परोपकार नहीं।  वसुधैव कुटुंबकम का मूलमंत्र,  सुनने में बहुत अच्छा लगता है।  पीड़ा होती है मन में जब कोई,   इंसान तिल तिल करके मरता है।  गिड़गिड़ा रही असहाय जनता,  इस लाचार पड़ी व्यवस्था में।  छीन लिया गया उनका संसार,  बेरहम धनलोलुप व्यवस्था ने।  धन का क्या है ओ खुदगर्जों,  धन तो फिर से कमा लोगे।  क्योँ करते हो कालाबजारी,  कौन सा महल तुम बना लोगे।  देह नहीं तो महल कैसा,  क्या तुम लेकर जाओगे। ,  जिस माटी में पले बड़े हो,  इस माटी में ही मिल जाओगे।  ये न भूलों ओ इंसानों,  ये देश नहीं, देव भूमि है महापुरुषों की,  जरा, इसकी थोड़ी सी तो लाज रखो।  अपने शर्मनाक कर्मों से, इस भूमि को  यूँ तो शर्मशार न करो।  यूँ तो शर्मशार.................. न क...

साँसों का संघर्ष (कविता)

साँसों का संघर्ष अभी जारी है, मौत जिंदगी पर सदैव भारी है। हर जगह अफरा तफरी है मची, यह समय बड़ा ही विस्मयकारी है। घूम रहे अचंभित लोग यहाँ वहाँ, हो रही साँसों की सौदेबाजी से। कहीं इंसानियत बिक चुकी तो, कहीं इंसानियत पर धर्म की पहरेदारी है। आँसू है, गम है, पीड़ा है अपार, इस नाउम्मीदी भरे माहौल में। दानव और मानव के इस युद्ध में, चमत्कार की भोर अभी बाकी है। प्रेषक- दीप्ति सोनी

यही है जीवन की यात्रा (कविता)

जिस काया को खूब सजाया,  अलग अलग किरदारों में निभाया।  उपलब्धियों का ताज पहनकर,  संसार में रहकर कुछ नाम कमाया।  उस काया का यूँ चले जाना,  कुछ कटु सवाल पूछता है।  आज जिंदगी मौत से हार रही,  क्या इतना ही रैन बसेरा है।  संघर्ष करके जो सफलता पाई,  सपनों की ऊँची उड़ान लगाई।  हर रिश्ते की मर्यादा रखकर,  संबंधों की लम्बी डोर सजाई।  सपने टूटे, रिश्ते भी छूटे,  धन भी अंत में काम न आपाया।  जिंदगी से मौत की इस पगडंडी पर,  अपना सत्कर्म ही कुछ फल दे पाया।  शवों की लम्बी कतार लगी,  हर शव एक दूसरे से पूछ रहा।  तू भी शांत, मैं भी शांत,  तुझमें, मुझमें फिर क्या भेद रहा।  इस काया ने जो सींची यात्रा,  कुछ पल में ही बस राख हुई।  कुछ तेज लपटों में जली, तो कुछ माटी में,सुपुर्दे खाक हुई।  हर पल ये सवाल मन में,  बार बार दस्तक करता है।  क्यों अहम का चोला ओढ़ के इंसान,  मेरा मेरा करता है, मेरा मेरा करता है।  लेखिका - दीप्ति सोनी

कोरोना का कहर (कविता)

मास्क बिके, सेनेटाइज़र भी बिके,  बिक रही आक्सीजन भी अब मोल।  कोरोना की इस भीषण सुनामी में,  साँसें भी पड़ रही अब कमजोर।  जगह जगह हाहाकार मचा रहा,  मच रहा रुदन और कहीं शोर।  सिस्टम भी लाचार बन पड़ा,  जनता देखे अब किस ओर।  ये इम्तहान की घड़ी है,  या घड़ी है इस कालचक्र की।  जो बच गया, समझो वही सिकंदर,  वरना छूटती जा रही, अब हर आस भी।  ये कभी सोचा किसी ने,  ऐसा कैसे और क्यों हुआ।  हवा भी दवा बन गयी,  इंसान घर में क्यों कैद हुआ।  कुछ गलत कर्म किये होंगे हमने शायद,  जो आज सजा ऐसी पायी है।  खुशनुमा इस धरती के आँगन में,  इस मंजर ने ली अंगड़ाई है।  जान है तो जहान है,  ये तो सब बतियाते है।  जिंदगी के लिए क्या है अनमोल,  पर ये क्यों भूल जाते हैं।  अब भी समय है,  सोचो, समझो चेतना में आओ।  प्रकृति कितनी अनमोल है,  इस बात को अपने मन में ठहराओ।  हम प्रकृति के दास है,  प्रकृति हमारी दासी नहीं।  करी थी जो हमने मनमानी,  तभी दिखती नहीं खुशहाली कहीं।...

होली एक अनूठा पर्व

इस धरती पर हर धर्म के अपने- अपने त्योहार हैं जो मनाये जाते हैं पर हमारे हिंदु धर्म का एक विशेष और अनोखा त्योहार है जिसे हम सब होली के नाम से जानते हैं। यह त्योहार न केवल मनाया जाता है वरन् खेला भी जाता है और इस रंग बिरंगे खेल को खेलना सिखाया आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व द्वापर युग के अवतारी पुरुष भगवान कृष्ण ने जिसने न केवल राधा और गोपियों के साथ भिन्न भिन्न रंगों से होली खेली अपितु एक ऐसे पर्व की नीँव रखी जिसे आज भी हिंदु धर्म में विश्वास रखने वाले बड़े हर्षोउल्लास से मनाते और खेलते हुए आ रहे हैं। निश्चित् रुप से यह पर्व है रंगों का तथा हर रंग अपने आप में इतना खूबसूरत और अर्थपूर्ण है जो आपस में मिलकर न केवल हर व्यक्ति व आसपास की फ़िज़ा को अपने रंगों से सराबोर कर देता है वरन इतना अनूठा बना देता है कि हम सब इन रंगों में भीगकर उतने ही खूबसूरत लगने लगते हैं जितनी सुंदर हमारी प्रकृति है। यह कहना गलत न होगा यह होली पर्व हमें प्रकृति के निकट ले जाता है, खुले आसमान के नीचे घरों से बाहर निकलकर , शिशु से लेकर वृद्ध अवस्था के हर व्यक्ति को एक पल के लिये एक ही अवस्था का बना कर के उस उन्मुक्त, अल्हड...

प्रकृति है जीवन का गहना (कविता)

प्रकृति है जीवन का गहना,  इसकी सुंदरता का क्या कहना | मनमोहक हरियाली सी चादर ओढ़े,  अदभुत छटा बिखेरे इसका हर कोना | पशु, पक्षी, मानव और जलचर,  पोषित होते इसके आँचल में | नदियाँ, सागर, पर्वत और झरने,  शोभित होते इसके आँगन में | सुबह - शाम का आना जाना,  प्रकृति का है ये सुगम तराना | रात लंबी काली सी चादर ओढ़े,  भोर में चिड़ियों का फिर गुनगुनाना | है अदभुत, अनोखा प्रकृति का हर दृश्य,  जो कराता हमें एक सुंदर एहसास | ये एहसास हमेशा सुंदर बना रहे,  ऐसा करते रहें हम हरदम प्रयास | एक पौधा अवश्य लगाये, प्रकृति की सुंदरता को बचायें।  लेखिका - दीप्ति सोनी