भक्ति और प्रेम में अंतर
मानव जीवन को सुखमय और आनंदमय बनाने में प्रेम और भक्ति का विशेष योगदान रहा है तथा किसी भी परिस्थिति में इन दोनों के बिना जीवन अधूरा है | तो क्या ये दोनों शब्द एक हैं या अलग | इसको समझना अति आवश्यक है |
भक्ति कि परिभाषा
मेरे अनुसार "भक्ति उस सेवा भाव का नाम है जिसमे पवित्र, निश्छल प्रेम और अटूट श्रद्धा का वास होता है अर्थात प्रेम और श्रद्धा के योग को भक्ति कहते हैं | "
जब व्यक्ति अपने जीवन में किसी अन्य व्यक्ति ,ईश्वर , निर्जीव वस्तु तथा स्थान के प्रति अपना निस्वार्थ प्रेम, विशवास और अटूट श्रद्धा रखता है वहाँ सहसा ही भक्ति की अविरल धारा बहती है | जैसे कि मनुष्य ने ईश्वर को कभी नहीं देखा है परन्तु वह अपनी साँसों में , वायु में व् इस पृथ्वी के हर कण कण में उस सूक्ष्म परन्तु विराट शक्ति को महसूस करता है तथा अपने अपने धर्म के अनुसार अपने इष्ट का पूजन, भजन व् ध्यान करता है , उसका हर पल स्मरण करता है तथा जो भी वह मन ,वचन और कर्म से उसके लिए कर सकता है वो सदैव करने का प्रयास भी करता रहता है और अपने आपको सौभाग्यशाली समझता है | यह भक्ति शब्द अपने आप में इतना गूढ़ और कभी न ख़त्म होने वाला आनंद को छुपाये हुए है जिसका आंकलन करना किसी साधारण मनुष्य की बात नहीं है | चाहें ये भक्ति अपने ईश्वर के प्रति हो , या फिर मातृ भक्ति , पितृ भक्ति , गुरु भक्ति , देशभक्ति क्यों न हो क्योंकि जब किसी व्यक्ति या स्थान के साथ भक्ति शब्द जुड़ जाता है तो वह उस शब्द को इतना सुदृढ़ और मजबूत कर देता है जिसमे अहम् और तर्क का कोई स्थान नहीं रहता है सिर्फ और सिर्फ प्रेम और श्रद्धा के मोतियों से पूवी एक भक्ति की माला होती है जिसे भक्त सदा जपता रहता है अर्थात हर क्षण उसका ध्यान करता रहता है और उसी सेवा भाव से वह हर क्षण उसके लिए प्रयत्नशील रहता है |
हमारे हिन्दू धर्म में सदैव नवधा भक्ति को श्रेष्ठ स्थान मिला है | नवधा भक्ति भगवान् के प्रति मनुष्य का अटूट प्रेम और श्रद्धा है जो नौ भागों में विभाजित है |
- श्रवन - इसमें मनुष्य भगवान् की लीला ,कथा और उनके महत्व का अंतर्मन से श्रवन करता है |
- कीर्तन - इसमें मनुष्य भगवान् के गुण , नाम और उनके पराक्रम का आनंद और उत्साह के साथ कीर्तन करता है |
- स्मरण - इसमें मनुष्य भगवान् का अन्तर्मन के भाव से स्मरण करता रहता है|
- पादसेवन - इसमें मनुष्य भगवान् के चरणों को ही अपना सब कुछ समझता है |
- अर्चन - इसमें मनुष्य अपने मन, वचन और कर्म द्वारा पवित्र सामग्री से भगवान् के चरणों का पूजन करता है |
- वंदन - इसमें मनुष्य भगवान् की मूर्ति को तथा भगवान् के अंश रूप में व्याप्त भक्तजन , ब्राह्मण ,गुरुजन, और अपने माता पिता आदि को परम आदर सत्कार के साथ ,अपने पवित्र भाव से प्रणाम करता है और उनकी सेवा करता है|
- दास्य - इसमें मनुष्य अपने भगवान् को अपना स्वामी और अपने को दास समझकर परम श्रद्धा के साथ सेवा करता है जैसे अर्जुन , कृष्ण को अपना स्वामी और स्वयं को उनका दास समझते थे |
- सख्य - इसमें व्यक्ति भगवान् को अपना परम मित्र/सखा समझकर उनसे अपने दिल की सारी बाते साझा करता है और सच्चे भाव से अपने पाप पुण्य का निवेदन करता है |
- आत्मनिवेदन - इसमें मनुष्य अपने आपको भगवान् के चरणों में पूर्ण रूप से सदा के लिए समर्पित कर देता है और बदले में वह अपने लिए कुछ नहीं चाहता है | यह भक्ति की सबसे उत्तम अवस्था मानी जाती है | जैसे महाराजा बलि ने भगवान् के दो पग जमीं मांगने पर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था |
- भक्ति एक आत्मिक संतुष्टि है जबकि प्रेम एक मानसिक संतुष्टि है |
- भक्ति में अहम् ,तर्क ,और स्वार्थ का अभाव होता है जबकि प्रेम में अहम् ,तर्क,लालच और स्वार्थ का भाव देखा जा सकता है |
- भक्ति का भाव पवित्र और निश्चल होता है जबकि प्रेम में कामासक्ति ,हठता ,व् दूसरों का अहित करके अपने को संतुष्ट करने की प्रवति देखी जा सकती है |
- भक्ति में मनुष्य का भाव अनावश्यक रूप से किसी को चोट पहुंचाना नहीं होता है जबकि प्रेम में मनुष्य परिस्तिथिवश किसी को शारीरिक व् मानसिक रूप से प्रेम के साथ साथ नुकसान भी पहुंचा सकता है|
- भक्ति मष्तिष्क का एक सकारात्मक भाव है जबकि प्रेम में परिस्तिथिवश सकारात्मकता और नकारात्मकता का भाव देखा जा सकता है |
- भक्ति पर समय का प्रभाव नहीं पड़ता जबकि प्रेम पर समय का प्रभाव पड़ता है | समय के साथ साथ प्रेम ज्यादा और कम हो सकता है|
- भक्ति में पवित्र प्रेम, श्रद्धा और विश्वाश का भाव होता है जबकि प्रेम में श्रद्धा और विश्वाश का भाव हो यह आवश्यक नहीं | प्राया प्रेम में लिपटी हुई चाटुकारिता को भी देखा जा सकता है |
- भक्ति भाषा व् ह्रदय की सुंदरता को व्यक्त करती है जबकि प्रेम भाषा के साथ -साथ मन की चंचलता को भी व्यक्त करता है |
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