ओलंपिक में नीरज चौपडा की स्वर्णिम जीत पर कविता

कभी अकेले तो कभी समूह में, 
खुद को साबित करना पड़ता है। 
हार जीत के इस तेज दौड़ में हरपल, 
अपनी कुशलता का प्रमाण भी देना पड़ता है। 

जीवन हो या फिर खेल का मैदान, 
दोनों की एक ही अहम सच्चाई है। 
जहाँ हो जीत का जज्बा और निरंतर प्रयास, 
उसकी झोली में ही हमेशा सफलता आयी है। 

शिखर हमेशा यूँ ही शिखर नहीं कहलाता, 
उसकी ऊँची चोटी ही उसका स्वाभिमान है। 
नीरज चौपडा की यह स्वर्णिम उपलब्धी, 
आज पूरे देश का बन गया अभिमान है। 

गर्व है हर हिंदुस्तानी को तुम पर नीरज, 
जो आज इस शिखर को तुमने चूमा है।
एक और स्वर्ण पदक भारत को दिलवाकर, 
सच में भारतवासीयों का दिल जीता है। 
सच में भारतवासियों का दिल जीता है। 

          "वंदे मातरम"

प्रेषक- दीप्ति सोनी




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