गुरुपूर्णिमा बनाम शिक्षक दिवस पर लेख
ऐसा कहा जाता है कि बच्चे के सबसे पहले गुरु उसके माता पिता होते हैं। जो उसे जीवन देते हैं परन्तु उस जीवन को किस ढंग से जीना है ये बच्चा एक कुशल गुरु के सानिध्य में आकर के ही सीख पाता है। अतः प्राचीन काल से ही हमारे जीवन में गुरुओं का विशेष योगदान रहा है। हमने प्राचीन कथाओं ,ग्रन्थों और कहानियों के माधयम से ये पढ़ा और सुना होगा कि कितने भी तपस्वी और बलशाली राजा क्यों न हुए हों उनके राज्य में उनके मार्ग दर्शन के लिए उनका कोई कुल गुरु अवश्य होता था। गुरु वशिष्ठ , गुरु द्रोणाचार्य ,गुरु संदीपनी ,देवगुरु बृहस्पति ,दैत्य गुरु शुक्राचार्य इत्यादि सभी गुरु इसी श्रेणी में आते थे तथा ये वो ही समय था जब गुरुकुल हमारे देश की शान हुआ करते थे वहाँ पर पढ़ने वाले बच्चे न केवल अपने गुरुओं का सम्मान करते थे वरन उनके बताये गए मार्ग पर चलकर एक संतुलित और प्रभावशाली जीवन को व्यतीत करने का प्रयास करते थे। प्राचीन काल में हर विषय क्षेत्र की शिक्षा देने वाला ही गुरु कहलाता था। तब आज के समय में उपयोग किये जाने वाले शब्दों जैसे टीचर ,अध्यापक ,शिक्षक ,मास्टर, मेंटर, सर इत्यादि शब्दों का कोई अलग अस्तित्व नहीं था। ये सभी शब्द गुरु शब्द के अंदर ही समाहित थे।
शास्त्रों के अनुसार गुरु शब्द दो अक्षरों से मिलकर बना है जिसमे "गु" का अर्थ है अंधकार या मूल अज्ञान और "रू" का अर्थ है निरोधक। अर्थात गुरु शब्द का अर्थ हुआ जो "अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाए वो ही गुरु कहलाता है।"
अतः वक्त बदलने के साथ साथ स्कूल ,कॉलेज ,ट्यूशन और कोचिंग सेंटर खुले और उनमे पढ़ाने वाले व्यक्तियों को सर, टीचर, मैडम, अध्यापक और शिक्षक के रूप में परिभाषित किया जाने लगा। तभी से हमारी शिक्षा दो भागों में विभाजित हो गयी। वेदों और शास्त्रों के ज्ञान से अपने शिष्यों को अवगत कराने वाले गुरु के रूप में परिभाषित किये जाने लगे। वहीं दूसरी ओर व्यावसायिक शिक्षा से अवगत कराने वाले और आत्मनिर्भरता का ज्ञान अपने विद्यार्थियों को देने वालों को शिक्षक के रूप में परिभाषित किया जाने लगा। हमारे देश में प्राचीन काल से ही ऐसे गुरुओं के सम्मान में आशाढ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है जो दिवस नहीं एक पर्व है गुरुओं के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने का ,वहीं दूसरी ओर वर्तमान समय में शिक्षकों के सम्मान में प्रत्येक वर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।
गुरु पूर्णिमा का महत्व
इस दिन महर्षि वेद व्यास जी का जन्म हुआ था। व्यास जी ऋषि पाराशर और माता सत्यवती के पुत्र थे। पूर्णिमा के दिन पैदा होने के कारण गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं। महर्षि वेद व्यास ने सर्वप्रथम मानव जाति को चारों वेदों का ज्ञान दिया। इसलिए उन्हें प्रथम गुरु की उपाधि दी जाती है। 18 पुराणों, श्रीमद्भागवत और महाभारत काव्य के रचयिता वेद व्यास को ही माना जाता है, इन्होंने ही भगवान द्वारा दिये गए एक वेद के ज्ञान को भावी पीढ़ियों की सुलभता के लिए चार भागों में विभाजित कर दिया। जिसके कारण इनका नाम वेद व्यास पड़ा। इनका दूसरा नाम कृष्ण द्वैपायन भी है। इनको तीनों कालो का ज्ञाता भी माना जाता है।
वर्तमान समय में बहुत से ऐसे हिंदू परिवार हैं जिन्होंने अपने अपने गुरु मना रखे हैं वह उन्ही के बताये मार्ग पर न केवल चलते हैं बल्कि उनकी बताई गई बातों को आत्मसात करके वर्तमान जीवन व अपने समाज में एक उपयुक्त संतुलन बनाने का भी प्रयास करते भी हैं। ऐसे गुरुओं द्वारा दिया गया ज्ञान, भक्ति और धर्म ज्ञान पर आधारित होता है जिसमें संस्कार समाहित हैं तथा जो आम जनमानस के जीवन को सही दिशा देने का मूल मंत्र भी है। तथा जिसके बिना व्यवसायिक ज्ञान का अस्तित्व भी खतरे में जान पड़ता है।
अतः यह कहा जा सकता है कि वर्तमान समय में प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षक के बताए व्यवसायिक ज्ञान को गुरुओं के बताये आध्यतमिक ज्ञान से जोड़कर जीवन में आगे बढ़ना चाहिए। तभी हम सब मिलकर न केवल अपने आपको, समाज को व देश को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकते हैं वरन एक नई विचारधारा का उदाहरण बनकर अपनी भावी पीढ़ियों को भी मार्गदर्षित भी कर सकते हैं। तभी गुरु पूर्णिमा का अनुष्ठान और और गुरुओं के प्रति कृतज्ञता की सार्थकता सिद्ध हो पायेगी।
प्रेषक- दीप्ति सोनी
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