कोरोना काल में शमशान की व्यथा(कविता)

सुबह भी जला, रात भी जला, 
भोर साँझ का न अब अता पता।
थक चुका हूँ मैं जलते जलते, 
आग की होली खेलते खेलते। 

अब मेरी रूह भी काँप रही, 
दृश्य भयावह दिखा रही। 
ऐसा मंजर मैने कभी न देखा। 
शवों का मानो लगा है मेला। 

अपनों की वो लंबी भीड़ कहाँ, 
वो पहले जैसी अब बात कहाँ। 
हर रिश्ता मुझमें जलकर खाक हुआ, 
मैं निशब्द सा ये दृश्य देख रहा। 

हर रिश्ता मुझसे यूँ पूछ रहा, 
मानों मैंने कोई जुल्म किया। 
न मैं अपराधी, न मैं दोषी, 
निस्वार्थ भाव से निभा रहा ड्यूटी। 

अब मेरी काया को आराम कहाँ, 
दो पल का अब विश्राम कहाँ। 
इतना तपा कि सब कुछ भूल गया, 
जहाँ खडा था, अब भी वहीं हूँ खडा। 

ऐ  वक्त, अब यहीं थम जा, 
मुझे हर पल अब यूँ न जला । 
मुझे कुछ पल का विश्राम तो दे, 
इस दुनिया को फिर से चैन और आराम तो दे। 

प्रेषक- दीप्ति सोनी

टिप्पणियाँ

Dhirendra ने कहा…
बहुत ही हृदय स्पर्शी

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