मृत्यु एक जटिल पहेली
मृत्यु एक ऐसा शब्द है जो अनगिनत प्रश्नों को जन्म देता है तथा व्यक्ति को उसके पूरे जीवन काल में अनेकों बार अपनी निश्चित्ता, भयावहता, मृत्यु के बाद की रिक्तता और गहरी शून्यता से सामना कराता है तब, जब कोई व्यक्ति का प्रिय हमेशा के लिये उसे छोड़कर इस दुनिया से चला जाता है चाहे वे उसका सगा संबंधी हो, प्रिय पशु हो या पक्षी हो इत्यादि। किसी अपने प्रिय की मृत्यु हमेशा पीड़ादायक होती है और यही वजह मनुष्य को हमेशा यह अहसास कराती है कि एक दिन उसे भी इस दुनिया को छोड़कर जाना पड़ेगा। इसलिए मनुष्य के चेतन मन में कभी न कभी यह ही बात चलती रहती है कि मृत्यु का क्या अर्थ है, यह क्यों होती है तथा मृत्यु के बाद इंसान कहाँ जाता हैं? इत्यादि।
मेरे अनुसार "जीवन के अंत का नाम मृत्यु है। "
मृत्यु इस जीवन का कठोर तथा ऐसा विचलित कर देने वाला सत्य है जिसे प्राणी से जुड़े उसके सगे संबंधियों को ऐक्षिक व् अनेक्षिक रूप से इसे स्वीकार करना ही पड़ता है। जिसने भी इस नश्वर संसार में जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है और यह जीवन का अटल सत्य है। यह सत्य इतना भयावह है कि जिसके बारे में सोचते ही मानव मन में एक खौफ बैठ जाता है तथा वह तरह तरह की आशंकाओं से घिर जाता है क्योंकि जब व्यक्ति जन्म लेता है तब उसका चेतन मन एक कोरे काग़ज़ की तरह होता है उसमें कोई चतुराई, अनुभव, ज्ञान, अपेक्षाएं, अनुराग, भावनाएं इत्यादि का कोई स्थान नहीं होता है। लेकिन समय बीतने के साथ साथ मनुष्य इस संसार से तारतम्य बनाते बनाते अपने जीवन का एक लंबा सफर तय कर लेता है और अनेक आशंकाओं से स्वयं को घिरा पाता है और सोचता है जो भी अभी तक रुपया, पैसा, उपलब्धियां कमाई थी, उसका उसके जाने के बाद क्या होगा व परिवार जन और उसके बच्चों का क्या होगा इत्यादि तथा यही सोचकर मनुष्य एक दिन जीवन के आखिरी पड़ाव पर अपने आपको खडा पाता है जिसे मृत्यु कहते हैं। परंतु इस मृत्यु के समय में भी विषमताएं हैं क्योंकि जिस पड़ाव की हम बात कर रहे हैं उससे तात्पर्य व्रद्धावस्था से है लेकिन मृत्यु किसी पड़ाव व निश्चित समय की मोहताज नहीं होती है उसके कई रूप हैं जैसे हत्या, आत्महत्या, जल जाना, ह्रदयघात, एक्सीडेंट हो जाना, कोई प्राकृतिक आपदा का आ जाना, पानी में डूब जाना, घातक बीमारी, अपनी व दूसरे द्वारा की गयी लापरवाही का शिकार हो जाना इत्यादि। ये सभी भिन्न भिन्न रूप मृत्यु का कारण बनते हैं जिसमें आयु सीमा का उल्लेख करना अनुचित जान पड़ता है। लेकिन सत्यता यह भी है कि जब मृत्यु आती है तब मनुष्य को चिंतन करने का मौका भी नहीं मिलता और पल भर में ही उसकी आत्मा जिसने शरीर में रहकर जीवन के अनेक उतार चढ़ाव देखे व उस शरीर के साथ इतना लंबा सफर तय किया वह उस नश्वर शरीर को त्याग कर तुरंत परमात्मा में विलीन हो जाती है। और यह ही मृत्यु की असहनीय सच्चाई है।
जन्म और मृत्यु में यह ही अंतर है कि जन्म संसार में प्राणियों की सोच व् भगवान प्रदत्त तय की गयी एक निश्चित अवधि का परिणाम होता है। जैसे इंसानों में बच्चे का जन्म माँ की कोख में नौ महीने की अवधि पूरा होने के बाद ही होता है तथा कभी कभी ये सात और आठ महीने की अवधि का भी परिणाम होता है। परन्तु प्रक्रिया सबकी समान होती है। वहीं दूसरी ओर मृत्यु का कोई तरीका या प्रक्रिया नहीं है। मृत्यु कहीं भी, किसी भी अवस्था में, सहमति व् असहमति से भिन्न भिन्न तरीकों से हो सकती है। मृत्यु सुगम से लेकर विकराल तक हो सकती है और जिसका सिर्फ और सिर्फ एक ही परिणाम है उस शरीर का अंत। जो किसी भी रूप में बहुत वेदना पूर्ण होता है। तभी जन्म को उल्लास और मृत्यु को मातम के रूप में स्वीकार किया जाता है। यानि एक अंधकार से प्रकाश की ओर शुरू हुई यात्रा फिर एक अंधकार में विलीन हो जाती है ।
आज इस संसार में हो रही असंख्य मृत्युओं का तांडव मन को विचलित कर देने वाला है। इसलिए आज मनुष्य मृत्यु की इस भयानक सच्चाई को स्वीकार कर रहा है।
मनुष्य यह भली भाँति जानता है कि मृत्यु अटल और निश्चित है तथा इसे कोई लाख प्रयत्न के बाद भी टाल नहीं सकता है।तभी व्यक्ति अपनी रोज की दिनचर्या में अनेकों सावधानियों को ध्यान में रखकर व अनेक नियमों का अनुसरण करके अपने कार्य करता है, उसका सावधानियों को ध्यान में रखकर कार्य करने का संबंध कहीं न कहीं मृत्यु व किसी अनहोनी के डर से होता है जिससे वह न केवल अपने आपको वरन अपने प्रियजनो को भी सुरक्षित रखना चाहता है। ताकि वो उस अंधकार से अपने आपको बचा पाये जिसमें जाने के ख्याल मात्र से ही मन अनेक आशंकाओं से घिर जाता है। तभी अक्सर यह कहते हुए सुना जाता है "मनुष्य का जीवन बहुत अमूल्य है इसे संम्हाल कर रखिये।" या फिर " सुरक्षा हटी तो दुर्घटना घटी। "
तथा तीसरे प्रश्न का उत्तर कि मनुष्य जन्म के बाद कहाँ जाता है और उसके साथ क्या होता है? इन सब प्रश्नों का जबाब हमें "गरुङ पुराण" में व्यापक रूप से मिल सकता है। गरुङ पुराण वैष्णव संप्रदाय से संबंधित है और सनातन धर्म में इसे मृत्यु के बाद सद्गति प्रदान करने वाला माना जाता है इसलिए सनातन हिंदु धर्म में मृत्यु के बाद गरुङ पुराण के श्रवण का प्रावधान है।
अतः निष्कर्ष रूप में हम यह कह सकते हैं कि यदि जीवन का अंत मृत्यु ही है तो इस मृत्यु आने से पहले का जीवन हर मनुष्य को बहुत ही आनंद पूर्ण व्यतीत करना चाहिए क्योंकि कई बार जीवन छोटा होता है पर बहुत सुंदर होता है तथा मृत्यु कभी भी आये उससे डरे बिना इस सुंदर जीवन के हर लम्हे का आनंद उठाना चाहिए।
लेखिका - दीप्ति सोनी
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