जन्माष्टमी उत्सव की बधाई



मेरे सभी प्रियजनों को कृष्ण जन्माष्टमी की बहुत बहुत बधाई | यह पर्व है उल्लास का, अनुष्ठान का और भगवान श्री कृष्ण के बताये आदर्शों को याद करके उन पर मनन करने का और उनके बताये मार्ग पर चलने का | जन्माष्टमी एक ऐसी मोहरात्रि है जिसमें भगवान कृष्ण के ध्यान, नाम और मंत्र जपने से समस्त प्राणियों की संसार से आसक्ति हटती है और वह कृष्णमय होकर एक अलौकिक आनंद की अनुभूति करते हैं क्योंकि आनंद और प्रेम का साक्षात स्वरूप प्रभु श्री कृष्ण हैं तभी तो उन्हें परमानंद भी कहा जाता है और ये आनंद और प्रेम संसार के समस्त प्राणियों के अंदर निहित है, इस प्रकार जब जब जन्माष्टमी आती है तब तब कृष्ण को मानने वाले और उस अनंत सत्ता में विश्वास रखने वाले उसी आनंद का अनुभव करते हैं जो कृष्ण को अनुभूत करने पर होती है | समस्त प्राणीजन उनके जन्मोत्सव पर आनंदमय हो जाते हैं और उनकी समस्त लीलाओं का ध्यान करके उनका पूजन व भजन कीर्तन करते हैं, उपवास रखते हैं, अनेक झांकियां सजाते हैं और अपने आप को सौभाग्यशाली समझते हैं| इसका एक कारण यह भी है कि "जब एक शरीर प्राण धारण करता है तभी उसी समय आनंद की भी उत्पत्ति होती है|" इसको हम ऐसे भी समझ सकते हैं कि जब एक मां बच्चे को जन्म देती है तो उस बच्चे के साथ उस आनंद का भी जन्म होता है जिसे वह अपने चारों ओर अपनी शिशु क्रीड़ाओं को करके बिखराता है और न केवल अपने चिर - परिचितों को आनंदित करता है बल्कि अंजान प्राणियों को भी अपनी मुस्कान और क्रियाकलापों से रिझाता है और उनके उदास चहरे पर भी एक मुस्कान लाता है | तभी यह कहा जाता है बच्चे भगवान का स्वरूप होते हैं जैसे भगवान कृष्ण न केवल यशोदा मैया को अपनी शरारतों से आनंदित करते थे वरन् गोकुल व समस्त चर अचर प्राणियों को भी आनंदित करते थे | इस प्रकार जो भी प्राणी भगवान कृष्ण का ध्यान करता है वो अपनी समस्त पीड़ाओं को भूल जाता है क्योंकि कृष्ण पीड़ा को हरने वाले हैं |
कहा जाता है कि "अहंकार आनंद का शत्रु है|" जहाँ अहंकार होगा वहाँ आनंद नहीं होगा, क्लेश होगा, पीड़ा होगी तथा वहीं दूसरी ओर जहाँ आनंद शरीर में समाया होगा वहाँ अहंकार का कोई काम नहीं | इसलिए कृष्ण का जन्म ही अहंकारी रूपी कंस का वध करने के लिये हुआ था तथा इसी दिन को ही हम सब कृष्ण जन्माष्टमी के नाम से जानते हैं | इस प्रकार इस कृष्ण जन्माष्टमी पर हम सबको ये प्रण लेना चाहिए कि  हमें अपने अहंकार को त्यागना है और जन्माष्टमी के पर्व को सार्थक करना है तथा उस अलौकिक आनंद को अनुभूत करना है जो भगवान ने हमें बिना मोल के दिया है| यूँ तो भगवान कृष्ण के अनेकों नाम है पर मैंने कुछ नामों को क्रमबद्ध करने का प्रयास किया है A to z तक |

A -   आनंद सागर
B -   बाल गोपाल
C -   चतुर्भुजधारी
D -   द्वारकाधीश
E -   ईशना
F -   फड़ेषुनृत्यकर्ता
G -   गोविंदा
H -   हरि
I -    इन्द्रप्रस्थ नाथ
J -   जगन्नाथ
K -   केशव
L -   लक्ष्मीकांत
M -  माधव
N -   नारायण
O -   ओनिश 
P -   पुरुषोत्तम
Q-    कूर्मअवतारी
R -   रविलोचन
S -   श्यामसुंदर
T -   त्रिलोकीनाथ
U -   उपेंद्र
V -   विश्वरूपा
W -  वासुदेव
X - ? 
Y -   यशोदानंदन
Z-    ज़नार्धना

ये सभी नाम भगवान कृष्ण के असंख्य नामों का एक छोटा सा उदाहरण हैं| वैसे जिस भी नाम से प्रभु को याद करो वे स्वतः ही दौड़े चले आते हैं | 
कुछ पंक्तियाँ भगवान कृष्ण की भक्ति को दर्शाती हुई कुछ इस प्रकार हैं |

है मुरली मनोहर गिरधारी, 
है माखन चोर ब्रज के वासी |
तुझमें ही है निहित जग सारा, 
तू ही है सबका पालन हारा |

सबके हृदय में वास है तेरा, 
मन चितवन में डाला तूने डेरा |
आनंद, प्रेम की, तू  है प्रतिमूरत, 
जहाँ देखूँ वहाँ पाऊँ तेरी सूरत |

तेरी टेढ़ी चितवन पे मैं वारी जाऊँ, 
है कृष्ण कन्हैया तुझे कैसे रिझाऊँ |
मेरे मन में जगी ये अभिलाषा, 
रटती रहूँ मैं तेरे नाम की माला |

है यशोदानंदन , ब्रज के गोपाला, 
तुझे माखन मिश्री खिलाऊँ मैं लाला, 
इस जन्माष्टमी के पावन अवसर पर, 
तुझे हिंडोले में झुलाऊँ मैं नंदलाला |

जब तक जीऊँ तेरा ध्यान रहे, 
जिव्हा पर बस तेरा नाम रहे |
आनंद बरसे तेरे हर कीर्तन में, 
भक्तों पे तेरी कृपा अपार रहे |

                             राधेश्याम🙏

(दीप्ति सोनी) 



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