पापा पर कविता

मेरे पापा मेरी पहचान, 
मेरे लिए हैं वो भगवान। 
जिस दिन पापा नाराज हो जाते, 
फीकी पड़ जाती मेरी मुस्कान। 

नन्ही सी मुझे गोद में खिलाया, 
अंगुलियाँ पकड़कर मुझे चलना सिखाया। 
पापा की हूँ मैं प्यारी बेटी, 
हर दिन मुझको कुछ अच्छा सिखाया। 

सुबह स्कूल उनका, मुझे छोड़ने जाना, 
स्कूल से मेरा फिर घर वापस आना। 
फोन करके पूछते ऑफिस से, 
बिटिया तुम आ गयी जरा बताना। 

हर चीज़ का वो मेरा ध्यान रखते, 
मेरे लिए हर दिन सोचते रहते। 
शिक्षित होकर काबिल बन जाऊँ, 
इसलिए दिन रात वो मेहनत करते। 

शनिवार, इतवार होते मेरे लिए खास, 
जब मैं जाती घूमने पापा के साथ। 
नयी नयी फरमाइश करती पापा से, 
नखडे दिखाती मैं उनको हजार। 

भगवान से मेरी अब यही प्रार्थना, 
मेरे पापा को देना खुशियाँ हज़ार। 
स्वस्थ, सुखी रखना हरदिन उनको, 
कभी न करना उनको उदास। 

(दीप्ति सोनी) 


दूसरी कविता

पिता बच्चों की मुस्कान हैं, 
पिता बच्चों का अभिमान हैं। 
पिता के साये में रहकर ही, 
बच्चों की खुशियाँ आबाद हैं। 

है कोई न दूजा पिता समान, 
जिसने परिवार को संम्भाला है। 
करके दिन - रात वो मेहनत, 
बच्चों का भविष्य बनाता है। 

हर कोशिश रहती उस पिता की, 
जो बच्चों की हमेशा ढाल है। 
दुनिया की हर खुशियाँ दूँ बच्चों को, 
करता इसका भरसक प्रयास है। 

ऊपर से कठोर बनकर जब, 
कभी देता बच्चों को डाँट। 
पर अपने मन की गहराइयों से, 
करता हरदम उनसे प्यार। 

करो पिता का हमेशा आदर, 
न करो कभी उनका अपमान। 
पिता के आशीर्वाद बिना है, 
जीवन के सब वैभव बेकार। 

(दीप्ति सोनी)





टिप्पणियाँ

Deepti Soni ने कहा…
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