रंग बिरंगी तितलियाँ (कविता)
फूल से भी हल्की, रंग बिरंगी
मैं तितली मैं तितली,
इधर उधर उड़ती हैं तितलियाँ।
उनका रूप मनमोहक इतना,
लुभाता सबको बनाके अपना।
सुंदर प्रकृति की सुंदरता पाकर,
इठलाती हैं जब ये तितलियाँ।
उंगलियों पर भी रंग छोड़ जातीं,
जब पकड़ने जाओ इनकी पंखुड़ियाँ।
हर फूल फूल पर जब भी वो,
जाती हैं उड़ उड़ कर बैठ।
फूल भी मुस्काते धीरे धीरे,
उनकी चंचलता को देख।
बच्चे करते आँख मिचोली,
जब उनकी सुंदरता को देख।
पाँव दवाकर जब पकड़ने जाते,
तितलियाँ उड़ जाती उनको देख।
(दीप्ति सोनी)
रंग बिरंगी मैं तितली।
सबके मन को भाती हूँ,
जब उड़ उड़ के इठलाती हूँ।
छोटा है आकार मेरा,
चंचलता व्यवहार मेरा।
जो कोई मेरे पास आता,
उसका मन मुझे पकड़ना चाहता।
फूलों का अभिमान हूँ मैं,
उपवन की पहचान हूँ मैं।
मैं हूँ हल्की फुल्की जान,
चाहता मुझको हर इंसान।
(दीप्ति सोनी)
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