गंगा की महिमा (कविता)
तू बड़भागिनी पावन गंगे,
भारत का श्रृंगार है तू गंगे।
जो कोई गोते लगाए तुझमें,
हो भवसागर से पार वो गंगे।
युगों युगों से बह रही है तू,
ऐसी निश्चल धार है गंगे।
तेरी शीतलता को महसूस करे हर कोई,
जब कोई आये तेरी शरण में गंगे।
सुबह शाम होती, तेरी आरती,
दीपदान भी होते हैं तुझ में गंगे,
घर के मंदिर को भी शुशोभित करती,
अपनी धारा को समेट के गंगे।
गंगा दशहरा हर बार जब आये,
तेरी महिमा का गुणगान हो गंगे,
पाप नाशिनी, मोक्ष् दायिनी,
नवचेतना का कल्याण है तू गंगे।। 🙏
(दीप्ति सोनी)
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